Friday, January 31, 2014

अरविंद केजरीवाल की नीली कार की पूरी कहानी

एक ब्लू ‘वैगनआर’ कार अचानक दिल्ली की राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गई है. नई तरह की राजनीति का दावा करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसी कार से चलते हैं. उन्होंने सरकारी गाड़ी नहीं ली है. इसी कार से वह शपथ लेने गए थे, इसी से सचिवालय भी जाते हैं. जब उन्हें धरना देने से रोक दिया जाता है तो इसी कार के बराबर में बिछौना बिछाकर, वह सो जाते हैं.
टीवी चैनलों और अखबारों में केजरीवाल के साथ-साथ उनकी इस ‘आम’ कार की तस्वीरें भी छाई हुई हैं. छोटी-छोटी बातों को गौर से देखने वाला सोशल मीडिया भी स्वेटर-मफलर के साथ इस कार पर चर्चा कर रहा है. बताते हैं आपको कि केजरीवाल की कार का किस्सा क्या है.
डोनेट की गई है कार
दरअसल इस कार को अरविंद केजरीवाल के एक दीवाने ने आम आदमी पार्टी डोनेट किया है. नाम है कुंदन शर्मा. लंदन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे. इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े. वही बैठे-बैठे अऩ्ना के आंदोलन के पक्ष में सोशल मीडिया पर लिखने लगे. आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई. पार्टी नई थी, लोगों से मदद की जरूरत थी. लंदन में बैठे कुंदन के मन में अपनी ब्लू वैगनआर कार डोनेट करने का ख्याल आया.

                                    पार्टी ने लेटरहेड पर दी रिसीविंग
कुंदन का घर दिल्ली के द्वारका में है. यह गाड़ी उनकी पत्नी श्रद्धा शर्मा के नाम पर थी. कुंदन बताते हैं, ‘घर पर कार की जरूरत न के बराबर थी. मेरा मन था कि कार आम आदमी पार्टी को डोनेट कर दी जाए, पर थोड़ा दुविधा में था. फिर निर्भया मामले में पार्टी का स्टैंड देखा तो खुद को रोक नहीं पाया. तय कर लिया कि इस राजनीतिक आंदोलन में जो मदद कर सकूंगा, करूंगा.’
कुंदन ने अरविंद केजरीवाल और AAP नेता दिलीप पांडे को ईमेल करके अपनी कार डोनेट करने की इच्छा जता दी. कुंदन चाहते थे कि जो भी गाड़ी ले, वह इसकी जवाबदेही भी ले. दिलीप पांडे से फोन पर बातचीत के बाद वह आश्वस्त हो गए और सब तय हो गया.
पार्टी ने लिखित में दी गाड़ी की रिसीविंग
1 जनवरी 2013, नए साल की पहली सुबह थी, जब कुंदन ने पहली बार अपने हीरो अरविंद केजरीवाल से फोन पर बात की. कुंदन के मुताबिक, ‘केजरीवाल ने कहा कि वह ड्राइवर के जरिये उनके घर से गाड़ी मंगवा लेंगे.’ 3 जनवरी 2013 को कुंदन के द्वारका स्थित घर से गाड़ी पिक कर ली गई. आम आदमी पार्टी ने अपने लेटर-हेड पर गाड़ी स्वीकार करने का प्रमाण पत्र दिया. इस पर लिखा है, ‘DL 9CG-9769 कार का मालिकाना हक आम आदमी पार्टी के पास होगा और इस पर अब श्रद्धा शर्मा की कोई जवाबदेही या नियंत्रण नहीं रहेगा.’

                                   कार की छत पर बैठी कुंदन की बेटी अग्रिमा
बच्चे ने पहचाना कार में लगा पेंडेंट
कार डोनेट करते वक्त कुंदन को नहीं मालूम था कि केजरीवाल ही इसका इस्तेमाल करेंगे. इसका पता उन्हें कैसे चला, इसके पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है. एक न्यूज चैनल पर केजरीवाल की कार दिखाई दी. कैमरा नजदीक गया तो डैशबोर्ड के ऊपर टंगा पेंडेंट भी दिखा. कुंदन के 6 साल के बेटे ने पेंडेंट पहचान लिया. वह बोला, ‘ऐसा पेंडेंट तो मम्मा की कार में भी था.’ लंदन में बैठे कुंदन ने जब यूट्यूब पर वह कार्यक्रम देखा, तो वह खुशनुमा हैरत से भर गए. उनकी डोनेट की हुई कार को उनका हीरो इस्तेमाल कर रहा था.
पार्टी के प्रति कुंदन की दीवानगी अब और बढ़ गई थी. वह सोशल मीडिया पर पार्टी के पक्ष में जमकर लिखने लगे. वह बताते हैं, ‘हमने वहां से 2-3 कैंपेन भी चलाए. संतोष कोली की मौत के बाद ‘आई एम संतोष’ और फिर 15 अगस्त पर ‘क्रांति एक्सप्रेस’ नाम से. इसके तहत लोगों को एक-एक लाख रुपये डोनेट करने के लिए प्रेरित किया. इस कैंपेन में मैंने 1.75 लाख रुपये डोनेट किए थे.’

                                       कार की आरसी
चुनाव से पहले दिल्ली लौटे कुंदन
लेकिन आखिरकार सब्र का बांध टूट गया. 4 दिसंबर 2013 को दिल्ली में चुनाव होने थे, नौकरी को अलविदा कहकर 2 दिसंबर को कुंदन दिल्ली आ पहुंचे. 4 तारीख को मटियाला विधानसभा में उन्होंने वोट डाला. 36 साल के कुंदन अब दिल्ली में ही रहते हैं. वह बताते हैं, ‘मेरे पिता सेना से रिटायर्ड हैं. उन्हें हर महीने 12 हजार रुपये की पेंशन मिलती है. जिसमें से उन्होंने 3000 रुपये आम आदमी पार्टी को डोनेट किए. मुझे मालूम है कि बहुत सारे लोग उनकी पेंशन से ज्यादा का इनकम टैक्स भरते होंगे. पर मुझे अपने पिता पर गर्व है.’

                                      कुंदन शर्मा
कुंदन ने हाल ही में रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैड (आरबीएस) में बतौर असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट जॉइन किया है. आम आदमी पार्टी के वह सामान्य सदस्य हैं. लोकप्रिय शब्दों में कहें तो ’10 रुपये वाले मेंबर’. मुस्कुराते हुए कुंदन कहते हैं, ‘मेरा बेटा अपूर्व आम आदमी पार्टी के लिए शगुन की तरह है. उसका जन्मदिन 8 दिसंबर को होता है. दिल्ली चुनाव के नतीजे उसके नाम से मेल खाते हैं.’ दिलचस्प बात यह कि कुंदन को आज तक अरविंद से मुलाकात का इंतजार है. फेसबुक पर उनका नाम है, ‘कुंदन शर्मा झाड़ू वाले’.

Thursday, January 30, 2014

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में

फिर दंगे की बात उभर आई। इस बार आवाज 2002 दंगों की नहीं है। इस बार आवाज सन 1984 के दंगों की है। एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू में पहली बार गांधी खानदान के चश्मो चिराग ने माना कि हां, कुछ कांग्रेसी भी इसमें शामिल रहे हो सकते हैं। बात शुरू हुई तो दूर तक जाएगी। सबने सवाल उठाए कि जब मानते हो तो कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की।इसका कांग्रेसी बड़ा मरा हुआ सा तर्क देते फिर रहे हैं कि ये गुजरात की तरह प्रायोजित दंगा नहीं था। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कोई एसआईटी नहीं बनाई। इसमें कई लोगों को सजा हुई है। कई कांग्रेसी जिन पर इनमें शामिल होने का शक था उनका करियर इससे प्रभावित हुआ है
अजीब हालत है। मुझे बशीर साहब का एक शेर याद आता है।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
इस देश की एक बदकिस्मती है कि कई घिनौने काम जो राजनीतिक पार्टियों ने किए हैं राजनीतिक फायदे के नाम पर उसकी कभी जवाबदेही नहीं हो सकी है। क्यों समय वहीं जाकर रुकता नहीं है, क्यों न्याय के लिए एक अदालत खुले में नहीं लगती, क्यों हमारा सारा तंत्र मौन हो जाता है। जब 84 हुआ तब भी भारत में एक तंत्र था और जब 2002 हुआ तब भी भारत में एक तंत्र था। ये तंत्र मौन क्यों हो जाता है। क्या बात है कि जब सिखों और मुसलमानों पर अत्याचार होता है तो राजनीतिक पार्टियों बार-बार भूल जाने को कहती हैं। क्या जो मरे वो भारतीय नहीं थे, क्या जो मरे वो कोई आतंकवादी थे, क्या जिनके साथ बलात्कार हुआ वो भारतीय महिलाएं नहीं थीं। इस निर्लज्ज मौन तंत्र को अभी तक शर्म क्यों नहीं आती। हमारे पुरखों ने इस तंत्र को क्यों बनाया है।
 कई बार लोग कहते है कि यार ये माइनोरिटी के लोग बार-बार दंगों का रोना क्यों रोने लगते हैं। हकीकत ये है कि वो इस पीड़ा से नहीं गुजरे हैं। ये सही समय है जब इस देश में पिछले जख्मों को भरने के लिए एक स्वायत्त राष्ट्रीय जांच आयोग का गठन किया जाए जिसकी परिधि में सन 84, सन 2002 समेत विगत में हुए कई दंगों जिनमें न्याय नहीं मिल सका उसकी जांच शुरू हो.. देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टिय़ों के तब के कार्यकलापों को भी इसकी जांच की परिधि में लाया जाए। बात अभी अधूरी है खत्म नहीं हुई। इस आयोग की जांच की परिधि में गांधी परिवार, कांग्रेस मोदी समेत बीजेपी के कुछ लोग लाए जाएं। ये जो भी हैं लेकिन देश के लोकतंत्र से बढ़ कर नहीं हैं।पर वही लाख टके का सवाल कि किसमें हिम्मत है ये पहल करने की... केजरीवाल ने 84 के दंगों पर एसआईटी जांच की मांग करके एक बार फिर राजनेताओं के जनदायित्व को निभाने की कोशिश की है। बेशक अकाली दल और बीजेपी ने इस बात का समर्थन किया है पर सवाल ये है देश के सारे राजनीतिक दल मिलकर इस बात पर सहमति बनाएंगे कि देश में दंगों पर एक राष्ट्रीय जांच आय़ोग बने जो पिछले सारे दंगों की फिर से जांच शुरू कर सके।


मत भूलिय़े न्याय से मुंह चुराने और राजनीतिक नकारापन के कारण इस देश को सिख आतंकवाद और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंक का सामना करना पड़ा है। देश का तंत्र पिछले कई बार फेल हुआ है और कीमत आम भारतीय ने चुकाई है। ये सही समय है जब हम सबके लिए न्याय की मुहिम चलाएं फिर चाहे वो बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक।मुझे अच्छी तरह पता है कि देश की ये दोनों बड़ी पार्टियों ऐसी किसी पहल को नहीं होने देंगी लेकिन मुझे हमारी न्याय व्यवस्था और नए उभरते राजनीति के दिग्गजों से जरूर उम्मीद है कि पिछे की गलतियों को सही करने के लिए जोरदार पहल का आगाज जरूर करेंगे। निश्चित तौर पर ये देश किसी मोदी, किसी गांधी की बपौती नहीं है। ये देश सवा सौ करोड़ लोगों की बपौती है जिसमें देश का हर तबका शामिल है और न्याय पाने का हक रखता है। हम नहीं चाहते कि हमारी आने वाली पीढ़ियां एक दूसरे को नफरत की नजर से देखें और एक दूसरे को भारतीय कहने के बजाए सिख, मुस्लिम, हिंदू कहें। जय हिंद

सड़कों पर उतरे सिखों की मांग- दंगों में शामिल कांग्रेसियों के नाम बताएं राहुल, सीबीआई ले बयान

नई दिल्ली. 1984 के सिख दंगों को लेकर कांग्रेस ऑफिस के बाहर सिख संगठन जोरदार प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी हाथों ने हाथों में काले झंडे लेकर हाय-हाय के नारे लगा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने ने लिए पुलिस ने बैरिकेड्स लगा दिए हैं। हालांकि प्रदर्शनकारियों ने एक बैरिकेड तोड़ दिया है। ये सिख संगठन कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी के हाल ही में एक इंटरव्‍यू में दिए बयान को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। राहुल गांधी ने इंटरव्‍यू में इस बात को स्‍वीकार किया था कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में कुछ कांग्रेसी शामिल थे। इस संगठनों की मांग है कि इन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाए। प्रदर्शन कर रहे संगठनों में अकाली दल और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (SGPC) के लोग भी शामिल हैं।a
 
वहीं, दूसरी ओर देश के कई मौलानाओं ने भी कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन और सोनिया व राहुल के चुनाव क्षेत्रों में उनके खिलाफ काम करने की धमकी दी है। मौलानाओं का आरोप है कि दिल्ली में वक्फ बोर्ड की जमीन को हथियाने में कांग्रेसियों की साजिश है।
 
यह कहा था राहुल ने इंटरव्‍यू में
 
अंग्रेजी न्‍यूज चैनल टाइम्‍स नाउ को दिए गए इंटरव्‍यू में राहुल से पूछा गया था, 'क्‍या 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस के लोग शामिल थे?' इस सवाल का जवाब देते हुए राहुल ने कहा था, 'कुछ लोग शायद शामिल थे।' अगले सवाल में राहुल से पूछा गया था, 'गुजरात दंगों पर मोदी की माफी की मांग करने से पहले क्या आपको 1984 के दंगों के लिए माफी नहीं मांगनी चाहिए?' तब इसके जवाब में राहुल ने कहा था, 'मैं 84 के दंगों में नहीं शामिल था। 1984 और गुजरात के दंगों में बड़ा अंतर है। 84 में सरकार ने दंगा रोकने की कोशिश की, जबकि गुजरात में सरकार ने दंगे भड़काए थे।' गौरतलब है कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों में सिखों को निशाना बनाया गया था।  
 
इससे पहले बुधवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उप राज्यपाल नजीब जंग से मिलकर मांग की थी कि 1984 के सिख विरोधी दंगों की एसआईटी जांच कराई जाए। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष एमएस धीर ने केजरीवाल की मांग का समर्थन किया है। धीर ने कहा है कि मुझे उम्मीद है कि ऐसे कदमों से पीड़ितों को इंसाफ मिलेगा।

84 दंगों पर राहुल के बयान के खिलाफ सिखों का प्रदर्शन, विपक्ष ने साधा निशाना

   84 दंगों पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बयान के खिलाफ सिख संगठनों ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. कांग्रेस मुख्‍यालय के बाहर हजारों की संख्‍या में सिख संगठन से जुड़े लोग पहुंच गए हैं.
मुख्‍यालय के बाहर जुटे सिख संगठन के लोगों ने मांग की है कि राहुल गांधी कांग्रेस के उन नेताओं का नाम जाहिर करें, जो दंगों में शामिल थे. वहां मौजूद लोगों ने कहा कि 84 में दंगा नही बल्कि कत्‍लेआम हुआ था. शिरोमणि अकाली दल समेत कुछ सिख संगठनों ने राहुल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.
गौरतलब है कि एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में राहुल गांधी ने कहा था कि 84 के दंगों में शायद कुछ कांग्रेसी भी शामिल थे, लेकिन उन्हें उनके किए की सजा मिल चुकी है. इस बयान के बाद सिख संगठनों ने राहुल के खिलाफ विरोध का बिगुल बजा दिया है. राहुल के घर और कांग्रेस मुख्यालय के बाहर सुरक्षा सख्त कर दी गई है.
राहुल के सिख दंगों पर दिए गए बयान पर विपक्षी पार्टियों ने हल्‍ला मचाना शुरू कर दिया है. एसपी नेता नरेश अग्रवाल ने कहा कि 84 दंगों की एसआईटी जांच होनी चाहिए. अगर राहुल ने कहा कि दंगे में कांग्रेसी थे, तो जांच होनी चाहिए. उधर, बीजेपी नेता विनय कटियार ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि राजीव गांधी चाहते थे कि दंगा हो. एसआईटी जांच की शुरुआत सोनिया गांधी से पूछताछ से होनी चाहिए, क्योंकि सोनिया प्रत्यक्षदर्शी थीं.
आम आदमी पार्टी (आप), अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बुधवार को दिल्ली में 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों की विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने की मांग की है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बुधवार सुबह उपराज्यपाल नजीब जंग से मुलाकात की तथा दंगों की एसआईटी द्वारा जांच कराने की मांग करते हुए अपना निवेदन सौंपा.
दूसरी ओर, हर्षवर्धन के नेतृत्व में भाजपा ने भी बुधवार दोपहर उपराज्यपाल से मुलाकात की. उपराज्यपाल से मिलने के बाद हर्षवर्धन ने मीडिया से कहा कि हम 1984 के दंगा पीड़ितों के लिए न्याय चाहते हैं, तथा दंगों की एसआईटी से जांच करवाए जाने की मांग कर रहे हैं.

 

Wednesday, January 29, 2014

मनमोहन सिंह के कार्यक्रम में हंगामा, आवाज उठाने वाले को मुंह बंद कर ले गई पुलिस

नई दिल्‍ली. यहां विज्ञान भवन में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण का विरोध हुआ है। वक्‍फ विकास निगम के इस कार्यक्रम में यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी भी मंच पर मौजूद थीं। प्रधानमंत्री ने अल्‍पसंख्‍यकों के कल्‍याण के लिए नई योजनाएं शुरू करने की बात की। इसका विरोध करते हुए डॉ. फहीम बेग नामक एक शख्‍स ने कहा कि जो योजनाएं हैं, उन्‍हें ही अमल में लाया जाए तो नई योजनाओं की जरूरत नहीं पड़ेगी। बेग ने आरोप लगाया कि अल्‍पसंख्‍यकों की अनदेखी हो रही है। इसी बीच सुरक्षाकर्मी वहां पहुंच गए और बेग का मुंह बंद कराते हुए उन्‍हें बाहर ले गए। इसके बाद वहां मौजूद अन्‍य लोगों ने इसे अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हमला बता कर इसका विरोध किया।
डॉ. बेग ने कहा कि वह दिल्‍ली के यमुना पार इलाके से आए हैं। उनके इलाके में अल्‍पसंख्‍यकों के विकास का कोई काम नहीं हुआ है। इस बारे में कई बार प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने के बावजूद कुछ नहीं हुआ है।
फहीम की शिकायत सुनेंगे प्रधानमंत्री
बाद में मीडिया के सामने आए डॉ. बेग ने कहा कि उनके विरोध के बाद प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी ने उनकी समस्‍याओं को गंभीरता से लेने की बात कही है। उन्‍होंने यह भी बताया कि अल्‍संख्‍यक मामलों के मंत्री को प्रधानमंत्री ने उनकी शिकायत सुनने को कहा है।
शिक्षा पर ध्‍यान न देने का आरोप
 
फहीम ने कहा कि सरकार ने अल्‍संख्‍यकों के लिए जो योजनाएं बनाई हैं, वे सही ढंग से लागू नहीं हो पा रही हैं। दिल्‍ली के यमुना पार इलाके में रहने वाले फहीम ने कहा कि यूपीए सरकार ने उनके क्षेत्र में शिक्षा पर भी ध्‍यान नहीं दिया है। उन्‍होंने कहा कि उनके क्षेत्र में पांच लाख की आबादी है, लेकिन शिक्षा के लिए मात्र एक स्‍कूल है। साथ ही यहां आईआईटी और पॉलिटेक्निक जैसे संस्‍थान भी नहीं हैं। 
 
'वजीर-ए-आजम की शान में कोई गुस्‍ताखी नहीं'
 
फहीम ने कहा कि उन्‍होंने अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखी और वजीर-ए-आजम की शान में कोई गुस्‍ताखी नहीं की। उन्‍होंने कहा कि सरकार के वादों और जमीनी हकीकत में काफी अंतर है। फहीम ने कहा कि उन्‍होंने 150 दिनों तक लगातार प्रधानमंत्री को पत्र लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। साथ ही फहीम ने बताया कि उन्‍होंने पीएम कार्यालय में फोन और फैक्‍स भी किया, लेकिन उन्‍हें निराशा ही हाथ लगी।

फंड जुटाया जा रहा बब्बर खालसा के लिए: अमेरिका

नई दिल्ली. खालिस्तान जिंदाबाद व बब्बर खालसा के लिए फंड जुटाने वाले नेटवर्क का पता चला है। अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने भारत को यह जानकारी दी है। बलविंदर सिंह संधू से पूछताछ में कई अहम जानकारियों मिली हैं। एफबीआई ने भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ और आईबी से ये सूचनाएं साझा की हैं। अमेरिका में 39 साल का बलविंदर फर्जी दस्तावेज के आधार पर रह रहा था। उसकी गिरफ्तारी के बाद पता चला कि वह भारत विरोधी मुहिम में लगा हुआ था।उसे खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स और बब्बर खालसा को पंजाब, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और हिमाचल के साथ देश के कई शहरों में काम करने के लिए पैसा जुटाने को कहा गया था।
इस काम में उसे कराची व इस्लामाबाद में लश्कर और जैश के अलावा दुबई में दाउद और जर्मनी व कनाडा के कुछ बड़े सिख संगठनों की मदद मिल रही थी। बलविंदर ने भारतीय जेल में बंद अब्दुल करीम टुंडा के भी इस काम में शामिल होने की बात कही है। एफबीआई के स्पेशल एजेंट इंचार्ज लोरा ए बुचेट ने बलविंदर से पूछताछ की है। वह लश्कर के जरिए इंडियन मुजाहिदीन के संपर्क में भी था। और पार्सल से कनाडा और नेपाल से पैसे भिजवाता था।
चुनाव से पहले आतंक फैलाने की साजिश
एफबीआई ने भारत को सतर्क किया है। बताया है कि खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स और बब्बर खालसा आतंकी वारदात, बड़े नेताओं को निशाना बनाने और राजनीतिक उथल-पुथल पैदा करने की भी योजना पर काम कर रहा है। बलविंदर ने बताया है कि चुनाव के पहले भारत में अशांति फैलाने की साजिश है। इसके लिए अमेरिका को मुख्य तौर पर नेटवर्क का केंद्र बनाया गया है

अंडरग्राउंड' इकोनॉमी में हड़कंप: रियल एस्टेट में तेजी से लगेगा काला धन!

नई दिल्ली. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के 2005 से पहले के नोटों को चलन से बाहर करने के एलान से देश की अंडरग्राउंड इकॉनमी में हड़कंप मचा हुआ है। सरकार की नजरों से दूर चलने वाली अर्थव्यवस्था में शामिल कई लोग अब पुराने नोट को नए नोट से बदलने और पुराने नोटों के सुरक्षित निवेश के रास्ते तलाशने की जुगत में भिड़ गए हैं। आर्थिक जानकारों का कहना है कि अब काला धन रियल एस्टेट, हीरा, सोना और चांदी जैसी चीजों को खरीदने में तेजी से लगाया जाएगा। 
 
 
एक हजार करोड़ रोजाना का है धंधा
 
रोजाना एक हजार करोड़ रुपए इधर से उधर पहुंचाने वाले कैश कूरियर (गुजराती भाषा में आंगड़िया) भी परेशान हैं। उनके पास रोजाना इतनी बड़ी मात्रा में रकम आती है कि उनके लिए नए और पुराने को छांटना और पुराने नोटों को नए में बदलना बहुत मुश्किल चुनौती है। उनके लिए रास्ता इसलिए मुश्किल है क्योंकि उनके धंधे का एक बड़ा हिस्सा बैंकों के दायरे से बाहर है। अगर उन्हें अपने पास आने वाली और पहले से इकट्ठा बड़ी रकम को नए नोटों में बदलना है तो उन्हें बैंकों के चक्कर लगाने पड़ेंगे। ऐसा करते हुए उनकी पहचान उजागर होने और उनके धंधे के सरकार की नजरों में सीधे तौर पर आने का खतरा भी है।
 
सोना, हीरा खरीदने में जुटे लोग
 
कैश कूरियर के रूप में काम कर रहे कई लोग नकद पैसे का एक हिस्सा खर्च कर सोना या हीरा खरीदने, कमीशन चुका कर पुराने नोटों के बदले चेक हासिल करने के लिए गैर कानूनी तौर पर ऑपरेट करने वाली कुछ कंपनियों से संपर्क कर रहे हैं।
 
आरबीआई का एलान
आरबीआई के एलान के मुताबिक 1 जुलाई से 500 या 1000 रुपए के 10 पुराने नोट बदलने के लिए पहचान पत्र और पते का सुबूत देना होगा। 
 रियल एस्टेट, गहनों की बिक्री में तेजी के आसार
 
आरबीआई के पुराने नोट बदलने के ऐलान के बाद अर्थव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि इस कदम से देश में छुपा काला धन तेजी से बाजार में आएगा। काला धन रखने वाले लोग मार्च से पहले अपनी रकम का इस्तेमाल रियल एस्टेट, हीरा, सोना या चांदी खरीदने में कर सकते हैं। इस वजह से इन चीजों के बाजार में रुपए का फ्लो तेज होगा, जिससे रियल एस्टेट में छाई मंदी भी दूर होने के आसार हैं। रुपए के फ्लो से रियल एस्टेट से जुड़े सीमेंट, सरिए और अन्य बिल्डिंग मैटेरियल के व्यापार में भी तेजी आने के आसार हैं। 
8 सालों में 4.8 लाख करोड़ की काले धन की रकम विदेश भेजी गई!
 
ऐसा माना जाता है कि भारत में बड़ी मात्रा में काला धन छुपा हुआ है। यही नहीं, देश के काले धन का एक बड़ा हिस्सा विदेशी बैंकों में भी जमा है। इनदिनों देश में यह बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी है। कुछ साल पहले आई ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी (जीएफआई) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 से 2008 के बीच भारत से 4.8 लाख करोड़ रुपए काले धन के रूप में विदेश भेजे गए। जीएफआई ने दुनिया के टॉप 20 ऐसे देशों की लिस्ट भी बनाई थी, जहां से सबसे ज्यादा काला धन विदेश भेजा जाता है। लिस्ट में भारत 15 वें नंबर पर था। इस मामले में चीन दुनिया में पहले नंबर का देश था। जीएफआई के मुताबिक चीन ने 8 सालों में 2176 अरब अमेरिकी डॉलर का काला धन विदेश भेजा था। वित्तीय मामलों के जानकार अरुण प्रभुदेसाई का कहना है कि वास्तव में देश के भीतर छुपाया गया काला धन और देश से बाहर भेजा गया कालाधन 4.8 लाख करोड़ रुपए से कहीं ज्यादा है
Challenge: बैंकों के डूबे कर्ज ने 6.5 लाख करोड़ का आंकड़ा छुआ 
 
भारतीय अर्थव्यवस्था को न सिर्फ काले धन से तगड़ी चुनौती मिल रही है बल्कि देश के बैंकों के डूब रहे कर्ज ने भी बड़े वित्तीय संकट की ओर इशारा किया है। भारत में सितंबर, 2013 तक पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की ओर से बतौर कर्ज दी गई 6.5 लाख करोड़ रुपए की रकम फंस चुकी है। क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि इस साल मार्च के अंत तक इसमें 3 लाख करोड़ की रकम और जुड़ जाएगी।  
 
पाकिस्तान के सरकारी छापेखाने में छप रहे भारतीय जाली नोट 
 
भारत के जाली नोट पाकिस्तान के सरकारी छापेखाने में छप रहे हैं। इस बात के पुख्ता सबूत रॉ, एनआईए, आईबी जैसी एजेंसियों ने जुटाए हैं। जाली नोट में इस्तेमाल किए गए कागज और स्याही वही है, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तानी छापेखाने करते हैं। जाली नोटों के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। खुफिया एजेंसियों ने यह जानकारी गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय के साथ ही वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति को भी दी है। इसके मुताबिक जाली नोट में जीएसएम के पेपर वैक्सपिक क्विटेंट और ऑलीविनी पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है। 2010 से 2011 तक 1700 से 1900 करोड़ रुपए के जाली नोट छापे गए। वहीं 2012 से अब तक 3,500 से 4,000 करोड़ रुपए के जाली नोट छापे गए। बांग्लादेश, नेपाल, थाईलैंड, मलेशिया श्रीलंका और चीन के जरिए जाली नोट भारत आ रहे हैं
कैसे काम करते हैं कैश कूरियर 
 
कैश कूरियर के रूप में काम करने वाले लोग कूरियर की जाने वाली हर रकम का आधा फीसदी बतौर कमीशन चार्ज करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी शख्स को दिल्ली से अहमदाबाद किसी के पास पैसे भिजवाने हैं तो उसे 5 हजार रुपए का कमीशन देना होगा। कैश कूरियर का काम करने वाले एक शख्स ने अपने काम करने के तरीके के बारे में बताया, 'हमें ग्राहक भेजी जाने वाली रकम के साथ कमीशन सौंप देता है। मैं उसे एक पासवर्ड देता हूं। इसके बाद जहां रकम भेजी जानी है, वहां बैठे अपने साथी को टेक्स्ट मैसेज भेजता हूं जो उसके पास आने वाले ग्राहक को रकम चुका देता है
कहां हैं कैश कूरियर के बड़े गढ़
 
कैश कूरियर का धंधा दिल्ली के चांदनी चौक, अहमदाबाद, सूरत और मुंबई में खूब चलता है। दिल्ली में अनाज, कपड़ा और अन्य चीजों के थोक व्यापारी कैश कूरियर का इस्तेमाल करते हैं। मुंबई में यह धंधा हीरे के कारोबार में खूब चलता है। 
 
कैश कूरियर करने वालों का दावा-कानूनी है धंधा
 
मुंबई आंगड़िया (कैश कूरियर) एसोसिएशन के अध्यक्ष अमृतभाई पटेल का कहना है कि उनका धंधा पूरी तरह से कानूनी है। दिल्ली में आंगड़िया के तौर पर काम करने वाले लोग बताते हैं कि वे ग्राहक को पर्ची देते हैं, जिसे सुबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है। लेकिन इस धंधे के जानकार बताते हैं कि जितनी रकम भेजी जाती है, उसके बहुत छोटे हिस्से को ग्राहक को दी जाने वाली पर्ची पर दिखाया जाता है

जानिए, केजरीवाल की चमत्‍कारिक जीत के सात कारण

नई दिल्‍ली। नई दिल्‍ली सीट से शीला दीक्षित की शर्मनाक हार सबसे चौंकाने वाला नतीजा रहा। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने 15 सालों से मुख्‍यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को 22 हजार वोटों के विशाल अंतर से हराया। हमारे एक्‍सपर्ट अनिरुद्ध शर्मा ने बता रहे हैं केजरीवाल की चमत्‍कारिक जीत के कारण
अन्‍ना के आंदोलन का फायदा – अन्‍ना हजारे के भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलनों का भी फायदा केजरीवाल को मिला। अन्‍ना के सभी आंदोलन नई दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर हुए थे। निर्भया आंदोलन में आम जनता के साथ पार्टी का खड़ा होना 'आप' के लिए सार्थक साबित हुआ। युवाओं में खास असर रहा
खुद की साफ सुथरी व ईमानदार छवि – आयकर विभाग के ज्‍वाइंट कमिश्‍नर के पद से इस्‍तीफा देकर राजनीति में आए और उनके ऊपर एक भी आरोप नहीं रहा। ये ठीक वैसा था जैसे कोई काजल की कोठरी से बेदाग निकल आए
वैकल्पिक राजनीति का रास्‍ता दिखाया – अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के रूप में दिल्‍ली की जनता के सामने नया विकल्‍प रखा जिसे मतदाताओं ने हाथों-हाथ लिया

चुनाव की रणनीति – कई महीने पहले से ही नई दिल्‍ली क्षेत्र में शुरू किया चुनावी प्रचार। डोर टू डोर कैंपेन पर रहा जोर। मुख्‍यमंत्री के तौर पर खुद को पेश करना भी कारगर साबित हुआ
इच्‍छा शक्ति और दृढ़ता - केजरीवाल के व्‍यक्तित्‍व की इच्‍छा शक्ति और दृढ़ता ने भी उनकी जीत के रास्‍ते को आसान बना दिया। केजरीवाल ने काफी पहले ही ऐलान किया कि मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित दिल्‍ली की जिस विधानसभा सीट से चुनाव लडेंगी वो भी उसी सीट से चुनाव लड़ेंगे
झाडू का चुनाव चिन्‍ह फायदेमंद हुआ साबित – आप के चुनाव चिन्‍ह् को सरकारी सफाईकर्मियों ने अपने दैनिक कामकाज में होने वाले झाडू से खुद को जोड लिया और जमकर समर्थन किया। इसके चलते कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक भी 'आप' की तरफ खिसक गया।
झाडू का चुनाव चिन्‍ह फायदेमंद हुआ साबित – आप के चुनाव चिन्‍ह् को सरकारी सफाईकर्मियों ने अपने दैनिक कामकाज में होने वाले झाडू से खुद को जोड लिया और जमकर समर्थन किया। इसके चलते कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक भी 'आप' की तरफ खिसक गया।

Thursday, January 23, 2014

कांग्रेस की AAP को धमकी, सोमनाथ भारती को नहीं हटाया तो वापस लेंगे समर्थन!

 

कांग्रेस की AAP को धमकी, सोमनाथ भारती को नहीं हटाया तो वापस लेंगे समर्थन!
नई दिल्ली. दिल्‍ली कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल को धमकी दी है कि अगर कानून मंत्री सोमनाथ भारती को मंत्रिमंडल से हटाया नहीं गया तो वह आम आदमी पार्टी की सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे। सोमनाथ भारती के इस्‍तीफे को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने भी 'आप' पर हमले तेज कर दिए हैं। भाजपा प्रवक्‍ता मुख्‍तार अब्‍बास नकवी ने 'आप' के मंत्रियों को 'अनगाइडेड मिसाइल' की संज्ञा दी है।
 
उन्‍होंने कहा कि सोमनाथ भारती को पद पर बने रहने का कोई हक नहीं है। दूसरी ओर सोमनाथ भारती ने इस्‍तीफे से साफ इनकार कर दिया है। 'आप' के नेता भी खुलकर उनका बचाव कर रहे हैं। पार्टी के वरिष्‍ठ नेता गोपाल राय से जब इस्‍तीफे के बारे में पूछा गया तो उन्‍होंने कहा- जब तक भारती दोषी नहीं पाए जाते, तब तक इस्‍तीफे का सवाल ही नहीं उठता। 
 
जानिए क्‍या है विधानसभा में सीटों का गणित 
 
* दिल्‍ली विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं 
* सरकार चलाने के 36 का आंकड़ा चाहिए 
* फिलहाल कांग्रेस के 8 विधायकों के समर्थन से केजरीवाल की सरकार चल रही है 
* आम आदमी पार्टी की 28 सीटें और कांग्रेस के 8 विधायक मिला कर आंकड़ा 36 हो जाता है। 'आप' की सरकार को मटिया महल से विधायक शोएब इकबाल ने भी समर्थन दे रखा है
* भाजपा के 31 विधायक हैं और उनके साथ शिरोमणि अकाली दल का एक विधायक भी है। ऐसे में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होकर भी विपक्ष में बैठी है
 

Sunday, January 19, 2014

10 ਸਾਲ ਪੁਰਾਣੇ 5 ਹਜ਼ਾਰ ਕੇਸ 31 ਮਾਰਚ ਤੱਕ ਨਿਪਟਾਏ ਜਾਣਗੇ : ਚੀਫ ਜਸਟਿਸ


ਸਮਾਂ ਵਿਹਾਅ ਚੁੱਕੇ ਕਾਨੂੰਨ ਬਦਲਣ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ : ਸੁਖਬੀਰ ਬਾਦਲ 
ਚੀਫ ਜਸਟਿਸ ਅਤੇ ਉਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਵੱਲੋਂ ਏ.ਡੀ.ਆਰ. ਸੈਂਟਰ ਦਾ ਉਦਘਾਟਨ
 
imageਬਠਿੰਡਾ, 18 ਜਨਵਰੀ ( punj)-ਚੀਫ ਜਸਟਿਸ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਜਸਟਿਸ ਸੰਜੇ ਕਿਸ਼ਨ ਕੌਲ ਨੇ ਅੱਜ ਇਥੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਵਿਕਲਪੀ ਝਗੜਾ ਨਿਵਾਰਣ ਕੇਂਦਰ (ਏ.ਡੀ.ਆਰ) ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਜਲਦ ਇਨਸਾਫ ਮੁਹੱਈਆ ਕਰਵਾਕੇ ਆਸ ਦੀ ਨਵੀਂ ਕਿਰਣ ਜਗਾਵੇਗੀ। ਅੱਜ ਇਥੇ ਚੀਫ ਜਸਟਿਸ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਅਤੇ ਉਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਪੰਜਾਬ ਸ. ਸੁਖਬੀਰ ਸਿੰਘ ਬਾਦਲ ਵੱਲੋਂ ਇਛੇ ਏ.ਡੀ.ਆਰ ਸੈਂਟਰ ਦਾ ਉਦਘਾਟਨ ਕਰਨ ਉਪਰੰਤ ਸਮਾਗਮ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਜਸਟਿਸ ਕੌਲ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ  ਪਰਿਵਾਰਕ, ਵਪਾਰਕ ਅਤੇ ਹੋਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਛੋਟੇ ਕੇਸਾਂ ਨੂੰ ਆਪਸੀ ਸੁਲ੍ਹਾ ਜ਼ਰੀਏ ਨਿਪਟਾ ਕੇ ਇਹ ਨਵੀਂ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਬਹੁਤ ਅਹਿਮ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸੁਲ•ਾ ਜ਼ਰੀਏ ਜਿੱਥੇ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਸਮੇਂ ਵਿ¤ਚ ਨਿਪਟਾਰਾ ਸੰਭਵ ਹੈ ਉਥੇ ਇਸ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਉ¤ਪਰ ਆਰਥਿਕ ਬੋਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ। ਜਸਟਿਸ ਕੌਲ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਸੰਵਿਧਾਨਕ ਹੱਕਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਜਾਗਰੂਕ ਹੋਣ ਨਾਲ ਵੀ ਕੇਸਾਂ ਵਿੱਚ ਵਾਧਾ ਹੋਇਆ ਹੈ ਜੋ ਇੱਕ ਉਸਾਰੂ ਪੱਖ ਵੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਹੀ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕੇਸਾਂ ਵਿੱਚ ਭਾਵੇਂ ਵਾਧਾ ਹੋਵੇ ਪਰ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਅਦਾਲਤਾਂ ਵਿੱਚ ਲਟਕਣਾ ਉ¤ਚਿਤ ਨਹੀਂ। 
ਇਸ ਮੌਕੇ ਅਦਾਲਤਾਂ ਵਿੱਚ ਲੰਬਿਤ ਪਏ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਕਰਦਿਆਂ ਜਸਟਿਸ ਕੌਲ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਵੱਲੋਂ ਪਿਛਲੇ 10 ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਸਮੇਂ ਦੇ 5000 ਦੇ ਕਰੀਬ ਲੰਬਿਤ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਨਿਪਟਾਰਾ ਆਉਂਦੀ 31 ਮਾਰਚ ਅਤੇ 5 ਸਾਲਾਂ ਤੱਕ ਦੇ 54000 ਲੰਬਿਤ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਨਿਪਟਾਰਾ 31 ਜੁਲਾਈ 2014 ਤੱਕ ਕਰਨ ਦਾ ਟੀਚਾ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਇਹ ਟੀਚਾ ਜ਼ਿਆਦਾ ਪੁਰਾਣੇ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਨਿਪਟਾਰਾ ਕਰਨ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਭਵਿੱਖ ਵਿੱਚ ਕੇਸਾਂ ਦਾ ਜਲਦ ਨਿਪਟਾਰਾ ਕਰਨ ਵੱਲ ਇੱਕ ਉਸਾਰੂ ਯਤਨ ਹੈ। 
ਜਸਟਿਸ ਕੌਲ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ਵਿੱਚ ਜੁਡੀਸ਼ੀਅਲ ਬੁਨਿਆਦੀ ਢਾਂਚੇ ਦੀ ਮਜਬੂਤੀ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ਦੀਆਂ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰਾਂ ਨੇ ਉਸਾਰੂ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ ਹੈ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਰਾਜਾਂ ਵਿੱਚ ਕਦੇ ਵੀ ਇਸ ਉਦੇਸ਼ ਲਈ ਵਿੱਤੀ ਕਮੀ ਨਹੀਂ ਆਈ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਉਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਸ. ਸੁਖਬੀਰ ਸਿੰਘ ਬਾਦਲ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅੱਜ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਪੁਰਾਣੇ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਦੀ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅੱਜ ਦੇ ਆਧੁਨਿਕ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਉਪਯੋਗਤਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਸੰਵਿਧਾਨਕ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਜਾਗਰੂਕ ਹੋਣ, ਤਕਨੀਕੀ ਤਰੱਕੀ ਅਤੇ ਆਬਾਦੀ ਦੇ ਵੱਧਣ ਕਾਰਨ ਵੀ ਕੇਸਾਂ ਵਾਧਾ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਕੇਸਾਂ ਦੇ ਸੁਭਾਅ ਵਿੱਚ ਵੀ ਸਮੇਂ ਨਾਲ ਫਰਕ ਆਇਆ ਹੈ। ਏ.ਡੀ.ਆਰ. ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਭਵਿੱਖਮੁੱਖੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਆਖਦਿਆਂ ਸ. ਬਾਦਲ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਇਹ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਘੱਟ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਇੰਨਸਾਫ ਦੇਣ ਲਈ ਕਾਰਗਰ ਸਾਬਤ ਹੋਵੇਗੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਇਹ ਵੀ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਇਛੁੱਕ ਹੈ ਕਿ ਜਲਦ ਤੋਂ ਜਲਦ ਹਰ ਜ਼ਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚ ਏ.ਡੀ.ਆਰ. ਕੇਂਦਰ ਖੁੱਲ੍ਹੇ ਅਤੇ ਇਸ ਖਾਤਰ ਕਿਸੇ ਕਿਸਮ ਦੀ ਵਿੱਤੀ ਘਾਟ ਨਹੀਂ ਆਉਣ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ। ਸ. ਬਾਦਲ ਨੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਰਾਹਤ ਦੇਣ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਸੁਧਾਰਾਂ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਅਜਿਹੇ ਸੁਧਾਰ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲਾ ਪੰਜਾਬ ਮੁਲਕ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਸੂਬਾ ਹੈ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਬਾਰ ਐਸੋਸੀਏਸ਼ਨ ਦੀ ਮੰਗ ਅਨੁਸਾਰ ਉ¤ਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ 2 ਕਰੋੜ ਰੁਪਏ ਦੇਣ ਦਾ ਐਲਾਨ ਵੀ ਕੀਤਾ। ਜਸਟਿਸ ਕੌਲ ਅਤੇ ਉਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਵੱਲੋਂ ਅੱਜ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਅਦਾਲਤੀ ਕੰਪਲੈਕਸ ਦੇ ਬਲਾਕ-ਸੀ ਦਾ ਨੀਂਹ ਪੱਥਰ ਵੀ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਐਗਜੈਕਟਿਵ ਚੇਅਰਮੈਨ ਪੰਜਾਬ ਲੀਗਲ ਸਰਵਿਸਿਜ ਅਥਾਰਟੀ ਜਸਟਿਸ ਜਸਬੀਰ ਸਿੰਘ, ਐਗਜੈਕਟਿਵ ਚੇਅਰਮੈਨ ਹਰਿਆਣਾ ਲੀਗਲ ਸਰਵਿਸਿਜ ਅਥਾਰਟੀ ਜਸਟਿਸ ਐਸ.ਕੇ.ਮਿੱਤਲ, ਜਸਟਿਸ ਜਤੇਂਦਰ ਚੌਹਾਨ ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਮੌਕੇ ਆਪਣੇ ਵਿਚਾਰ ਪ੍ਰਗਟਾਏ। ਅੰਤ ਵਿੱਚ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਤੇ ਸੈਸ਼ਨ ਜੱਜ ਸ੍ਰੀ ਤੇਜਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਵੱਲੋਂ ਆਏ ਹੋਏ ਮਹਿਮਾਨਾਂ ਦਾ ਧੰਨਵਾਦ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਜਸਟਿਸ ਰਾਜੇਸ਼ ਬਿੰਦਲ, ਜਸਟਿਸ ਕੇ.ਸੀ.ਪੁਰੀ, ਜਸਟਿਸ ਆਰ.ਕੇ.ਗਰਗ, ਜਸਟਿਸ ਐਮ.ਐਸ.ਸੁੱਲਰ, ਜਸਟਿਸ ਪਰਮਜੀਤ ਸਿੰਘ, ਜਸਟਿਸ ਐਸ.ਪੀ.ਬਾਂਗੜ, ਜਸਟਿਸ ਜਸਪਾਲ ਸਿੰਘ, ਚੀਫ ਜੁਡੀਸ਼ੀਅਲ ਮੈਜਿਸਟ੍ਰੇਟ-ਕਮ-ਸਕੱਤਰ ਜ਼ਿਲ•ਾ ਕਾਨੂੰਨੀ ਸੇਵਾਵਾਂ ਅਥਾਰਟੀ ਦਲਜੀਤ ਸਿੰਘ ਰੱਲ•ਣ, ਮੁੱਖ ਸੰਸਦੀ ਸਕੱਤਰ ਸ੍ਰੀ ਸਰੂਪ ਚੰਦ ਸਿੰਗਲਾ, ਵਿਧਾਇਕ ਸ੍ਰੀ ਦਰਸ਼ਨ ਸਿੰਘਕੋਟਫੱਤਾ, ਡਿਵੀਜ਼ਨਲ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਸ੍ਰੀ ਐਸ.ਕੇ.ਸ਼ਰਮਾਂ, ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਸ੍ਰੀ ਮੁਹੰਮਦ ਤਇਅਬ, ਉਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਹਾਇਕ ਮੀਡੀਆ ਸਲਾਹਕਾਰ ਸ੍ਰੀ ਹਰਜਿੰਦਰ ਸਿੱਧੂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਹੋਰ ਵੀ ਸ਼ਖਸੀਅਤਾਂ ਹਾਜ਼ਰ ਸਨ।

शामली और मुज़फ्फरनगर के दंगा राहत शिविर में रह रहे लोगों के हालातों पर एक रिपोर्ट

पीपल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स, दिल्ली
उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर, शामली, बाघपत, मेरठ, और सहारनपुर जिलों के ग्रामीण इलाकों में सितम्बर के पहले हफ़्ते में हुए दंगों के बाद से हज़ारों मुसलमान चार महीने से राहत शिविरों में रह रहे हैं | पिछले हफ़्ते से, उत्तर प्रदेश सरकार ने जबरन शिविर बंद करने और लोगों को वहाँ से निकालने की नीति अपना ली है | परिणामस्वरूप दंगा-पीड़ित लोग और भी ज़्यादा परेशान और असुरक्षित हो गए हैं |
पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पी.यू.डी.आर.) की तरफ से एक पांच सदस्यीय जांच दल  28 से 30 दिसंबर 2013 के बीच राहत शिविरों का दौरा करने गया | उद्देश्य था कि शिविरों में रह रहे लोगों के हालत और उन्हें हो रही परेशानियों का जायजा लेना | टीम ने 8शिविरों का दौरा किया और 60 से भी ज्यादा गाँवों के लोगों से बातचीत की | शामली ज़िले में टीम ने मलकपुर, बर्नावी, कांधला, और मदरसा(शामली शहर) शिविरों का दौरा किया | मुज़फ्फरनगर ज़िले में टीम ने लोई, शाहपुर, जोगिया-खेडा और जॉला शिविरों का दौरा किया | इसके साथ, टीम ने 5 अन्य शिविरों के लोगों से मुलाक़ात की | कुल मिलाकर पी.यू.डी.आर. ने 13 शिविरों के लोगों से बातचीत की | टीम ने शामली के ज़िला अधिकारी, मुज़फ्फरनगर के अतिरिक्त ज़िला अधिकारी, फुगाना थाना के थाना अधिकारी (एस.एच.ओ.), लोई और जोगिया खेडा गाँव के प्रधान, सवास्थ्य-कर्मियों, शिक्षकों, पत्रकारों, धार्मिक संगठनों के सदस्यों, शिविर समितियों के सदस्यों, और अन्य गैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़े राहत कर्मियों से बातचीत की |
टीम के मुख्य निष्कर्षों का सारांश इस प्रकार है -
1.      जबरन राहत शिविरों से दंगा-पीड़ितों का निकाला जाना
दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले की सुनवाई और मीडिया द्वारा पीड़ितों के हालातों के बारे में लगातार ख़बरें दिए जाने का उल्टा असर हुआ है | प्रशासन अब शिविरों को बंद करने पर तुल गया है और लोगों को हटाने के लिए अब तरह-तरह के तरीके अपनाए जा रहे हैं | जैसे कि पीड़ितों के खिलाफ़ सरकारी ज़मीन पर अनधिकृत रूप से रहने के लिए मामला दर्ज़ कराना, राहत शिविर समितियों पर दबाव डालना, बड़े पैमाने पर लोगों को डराने के लिए पुलिस और अफसरों की मौजूदगी और दंगा पीड़ितों कि बड़ी बस्तियों को तोड़ना |
29 और 30 दिसंबर को लोई शिविर में रह रहे खरड गाँव के सौ से भी ज़्यादा परिवारों को किसी सरकारी बैरक में अस्थायी रूप से स्थानांतरित किया जा रहा था | उन्हें यह कहकर हटाया जा रहा था, की ऐसा उन्हें ठण्ड से बचाने और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए किया जा रहा है | इन्हें अभी तक पुनर्वास मुआवज़ा नहीं मिला है |
यह स्पष्ट है की दंगों के बाद लोग अपने गाँव वापस जाने के ख्याल से ही असुरक्षित महसूस कर रहे हैं | उन मामलों में यह असुरक्षा और भी ज्यादा है जिन में हमलावरों के खिलाफ केस तक दर्ज़ नहीं किया गया है और हमलावर उन्हें धमकाते हुए खुले घूम रहे हैं | इसके बावजूद अन्य गावों के परिवारों को शिविर छोड़कर अपने-अपने गाँव जाने के लिए कहा जा रहा था  |
2.      सरकारी एजेंसियों द्वारा राहत मुहैय्या कराने में उदासीनता
हमारी टीम ने पाया की एक भी राहत शिविर ऐसा नहीं था जिसे सरकार ने शुरू किया हो या जिसका प्रबंधन सरकार द्वारा किया जा रहा हो | ज़्यादातर राहत शिविर मुसलमान-बाहुल्य गाँवों के पास पाए गए, जहां पीड़ित लोग दंगों के दौरान भागकर आये थे |
हर शिविर में हमें प्रशासन की ओर से राहत सामग्री और सुविधाएं मुहैय्या कराने में उदासीनता के बारे में बताया गया | शिविर शुरू होने के 2 हफ्ते बाद से ही प्रशासन द्वारा राहत सामग्री उपलब्ध कराई जानी शुरू की गयी | 1 अक्टूबर के बाद प्रशासन ने शिविरों में खाद्य सामग्री भेजनी भी बंद कर दी गई, जॉला और जोगिया खेडा शिविरों में भी हमें ऐसा बताया गया | शीत लहर के निकट आने और 21 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रशासन को राहत सामग्री दोबारा मुहैय्या कराने के आदेश के बाद भी गरम कपड़े या कम्बल उपलब्ध नहीं करवाए गए |
दिसंबर में जब प्रार्थियों ने, शिविरों में हुई 39 मौतों के बारे में सबका ध्यान केन्द्रित किया, तब जाकर प्रशासन ने 5 शिविरों में प्रत्येक परिवार के लिए दवाइयाँ और200 मी.ली. दूध बांटना शुरू किया |
शिविरों में बहुत सारे विद्यालय जाने वाले छात्र भी हैं | हालांकि कुछ जगहों पर प्राथमिक विद्यालयों की सुविधाएं उपलब्ध करवाई गईं हैं पर बड़ी कक्षाओं के बच्चों की पढ़ाई रुक गई है | पास के विद्यालयों में दाखिला देने से मना किया जा रहा है | सबसे बुरा प्रभाव तो छात्राओं पर हुआ है | और जिन बच्चों की पिछले साल बोर्ड की परीक्षा थी वे तो इम्तिहान देने का मौका खो ही चुके हैं | इन बच्चों ने न सिर्फ अपना एक साल गवाया है, बल्कि अब इनकी आगे की पढ़ाई बंद हो जाने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं |
स्वास्थ्य सुविधायें न के बराबर हैं | ज़्यादातर शिविरों में थोड़ी-बहुत दवाइयां ही बांटी जा रही  हैं | शामली के ज़िला अधिकारी ने इस बात पर खेद भी जताया और इसका दोष खुद के ज़िले में उदासीन स्वास्थ्य सेवाओं पर मढ़ दिया | कई महिलाओं ने शिविरों में ही बच्चों को जन्म दिया है और कई गर्भावस्था के आखिरी पढ़ाव पर हैं | एक अच्छे स्त्रीरोग विशेषज्ञ की सुविधायें पूरे ज़िले में कहीं उपलब्ध नहीं हैं, शिविरों में तो दूर की बात है | इन महिलाओं को पौष्टिक खाना उपलब्ध करवाने का प्रयास भी नहीं किया गया है | फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक समिति का गठन किया गया है जो शिविरों में हुई 34 बच्चों की मृत्यु के कारणों कि जांच कर रही है.
  1. वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा सूचित राहत शिविरों की संख्या असल संख्या से कम
दिसंबर में राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायलय में दर्ज़ कराये गए एक शपथ-पत्र में कहा गया है की सितम्बर महीने में 58 शिविर चल रहे थे | शपथ-पत्र के अनुसार यह आंकड़ा घटकर दिसंबर में 5 हो गया था (4 शामली में और 1 मुज़फ्फरनगर में ) | हमारी टीम द्वारा यह कथन बिलकुल असत्य पाया गया |
शिविर-वासियों ने हमें बताया की 25 गाँवों में राहत शिविर चल रहे हैं | इनमें से कुछ गाँवों में एक से अधिक शिविर भी हैं | हमारी टीम द्वारा 13 ऐसी जगहों का दौरा स्वयं किया गया और अभी भी शिविर चल रहे हैं | कई पीड़ित लोगों को ठण्ड के कारण पास के घरों में शरण दिलाई जा चुकी है | इसलिए जितने लोग हमें शिविरों में दिखे, वे ज़ाहिर तौर पर असल में शिविरों में रह रहे लोंगों से कम ही थे |
30 दिसंबर को लोई शिविर में टीम की मुलाक़ात मुज़फ्फरनगर के अतिरिक्त ज़िला अधिकारी से हुई | उन्होंने जो हमें बताया उससे हम सबसे ज़्यादा अचम्भित हुए | उनका कहना था कि शाहपुर गाँव में कोई शिविर नहीं चल रहा | ठीक एक घंटे के बाद हमारी टीम ने शाहपुर में 3 क्रियाशील शिविर देखे |
सरकारी सूची से इतने सारे शिविरों का छूट जाना प्रशासन के बेरुखे व्यवहार को दर्शाता है | परिणामस्वरूप हज़ारों पीड़ित लोग राहत के लिए निजी संस्थाओं पर निर्भर हैं | यह खुले तौर पर जनता को गुमराह करने का प्रयास है |
4.      दंगा प्रभावित लोगों के गुमराह करने वाले आंकडे
राहत शिविरों में जिला प्रशासन द्वारा स्वयं निरीक्षण न किए जाने का एक परिणाम यह हुआ है कि दंगा-पीड़ितों की संख्या का कोई एक निष्पक्ष आंकड़ा नहीं है | 4अक्टूबर 2013 को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित हार्मनी कमिटी द्वारा अपनी रिपोर्ट में कुल आतंरिक तौर पर विस्थापित लोगों की संख्या 33,696 बताई गई है | इनमें लगभग 74% लोग मुज़फ्फरनगर के शिविरों में रह रहे थे, 22% कैराना, 3.3 % शामली और 0.7 % बागपत के शिविरों में | दिसंबर तक सर्वोच्च न्यायलय में जमा किये गए सरकारी शपथ-पत्र में शिविरों में रह रहे कुल पीड़ितों की संख्या 5,024 घोषित की गई |
इस आंकड़े की असत्यता राहत शिविरों पर उपलब्ध शिविर-वासियों के रिकॉर्ड से साफ़ साबित हो जाती है | राहत सामग्री के आबंटन के दौरान, प्रत्येक शिविर में राहत समिति द्वारा बनाए गए पीड़ितों के रिकॉर्ड, एकमात्र सबसे सटीक रिकॉर्ड हैं | सिटीजन फार जस्टिस एंड पीस बनाम उत्तर प्रदेश सरकार  (याचिका क्र. 170 वर्ष 2013)के मामले में प्रार्थियों द्वारा दर्ज़ कराये गए अतिरिक्त शपथ-पत्र के अनुसार 6 दिसंबर तक राहत शिविरों में 27,882 लोग रह रहे थे | हमारी टीम द्वारा 13 शिविरों के दौरे के बाद विस्थापित लोगों का जो अनुमानित आंकड़ा निकाला गया है, वह लगभग इस आंकड़े से मेल खाता है |

5.      'दंगा-पीड़ित' गाँवों और लोगों कि श्रेणी में डाले जाने में खामियां
राहत समितियों द्वारा हमें बताया गया की 162 गाँव के परिवारों ने अपना घर छोड़कर शिविरों में शरण ली है | स्वयं हमने 60 गाँवों के लोगों से बातचीत की | हालांकि सरकारी तौर पर सिर्फ 9 गाँव ही दंगा-ग्रस्त करार दिए गए | इसलिए सिर्फ 9 ही गाँवों के लोगों को सरकारी पुनर्वास पैकेज का फायदा मिल सकता है |
सबसे अधिक हत्याएं होने के आधार पर जो 9 गाँव दंगा-ग्रस्त घोषित किये गए हैं, उनके नाम हैं - लाक, लिसाड़, बहावड़ी, कुटबा, कुटबी, मोहम्मदपुर रायसिंह, काकरा,फुगाना, और मुंडभर | सरकारी पैकेज के अनुसार इन 9 गाँवों से लगभग 1800 परिवारों को दंगा-ग्रस्त चिन्हित किया गया है | ये सभी सरकारी पैकेज के तहत एक मुश्त राशि 5,00,000 रूपए प्राप्त करने के हक़दार हैं |
पर इन 9 गाँवों के लोगों के अलावा भी कई ऐसे लोग हैं जो अपने घर लौटने की स्थिति में नहीं है | उन्होंने अपने हिन्दू पड़ोसियों द्वारा धमकियों और बेइज्ज़ति का सामना किया है | सशस्त्र दंगाइयों द्वारा उनके घरों में तोड़-फोड़ और औरतों के साथ दुर्व्यवहार किया गया है | जब वे पुलिस के साथ अपने घर वापस गए तो उनके घर लूटे जा चुके थे | और कुछ मामलों में जहां परिवार के लोग दंगों के दौरान भाग कर नहीं आ सके थे, वे अब तक (तीन महीने बाद भी) लापता हैं |
ये गाँव और यहाँ के मुसलमानों को दंगा-ग्रस्त नहीं माना जा रहा है और इसलिए वे पुनर्वास के हक़दार नहीं हैं | इनमें से कई लोगों ने, जिनसे हमारी टीम ने बात के दौरान बताया कि वे 7 या 8 सितम्बर की रात को घर से खाली हाथ, सिर्फ दो कपड़ों में भागकर आये थे |
6.      संदिग्ध पुनर्वास पैकेज और उसकी शर्तें
राज्य सरकार का हर परिवार के लिए 5 लाख रुपयों के एक मुश्त पुनर्वास पैकेज में बहुत समस्याएँ हैं | यह पैकेज न तो गाँव में घर के आकर पर आधारित है और न ही घर में बसे परिवारों की संख्या पर | इसलिए 9 चिन्हित गावों में से भी, शिविर में रह रहे हर परिवार को 5 लाख रूपए नहीं मिल पाए हैं | जहां एक ही घर में एक से ज़्यादा परिवार रह रहे थे, वहाँ यह परेशानी सबसे ज्यादा देखने को मिली | इन परिवारों में, सिर्फ परिवार के मुखिया को ही रूपए दिए गए और सयुंक्त परिवार के बाकी छोटे परिवारों को नहीं दिए गए |
इसके अलावा, पुनर्वास की शर्तों के अनुसार अगर लाभार्थी कभी भी अपने घर वापस जाते हैं, तो उन्हें यह 5 लाख रूपए लौटाने पड़ेंगे | पीड़ितों के पास मौजूदा स्थिति में, जहां वे खुले आसमान के नीचे टेंटों में रह रहे हैं और घर वापस लौटने की उम्मीद बहुत कम है, पुनर्वास स्वीकार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है | इसके बाद एक बार अगर उनसे यह रुपये खर्च हो जाते हैं, तो मजदूरी करने वाले ये परिवार कभी इन रुपयों को लौटा नहीं पाएंगे | इस प्रकार सरकारी नीति यह सुनिश्चित करती है की पीड़ित व्यक्ति कभी अपने घर लौट ही न पाएं | ऐसे में यह पुनर्वास पैकेज वास्तव में एक ऐसा क्षतिपूरक पैकेज है जो हर तरह से लोगों को हुई उनकी क्षति की भरपाई करने में नाकामयाब साबित होता है |
दूसरी तरफ, सरकार ने पीड़ितों के घरों और सामुदायिक संपत्ति जैसे मस्जिद, ईदगाह, मदरसे, कब्रिस्तान आदि की सुरक्षा के लिए कोई ज़िक्र नहीं किया है | ये संपत्तियां समय के साथ उन्हीं लोगों के हाथों में पड़ जाएंगी जो मुसलामानों के खिलाफ हिंसा करने के लिए ज़िम्मेदार हैं | इससे भविष्य में साम्प्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छे आर्थिक फायदे के रूप में भी देखा जा सकता है |
आखिर में, इस पूरी प्रक्रिया में जो बात बिलकुल छिप जाती है वह है राज्य की अभियोज्यता | मुख्य रूप से, क्योंकि राज्य पीड़ितों को साम्प्रदायिक हिंसा से बचा नहीं पाया, क्योंकि अपराधी आज भी आज़ाद घूम रहे हैं, और क्योंकि पीड़ितों को अच्छी सुरक्षा नहीं मिल पा रही है, इसीलिए आज पीड़ित अपनी जिंदगियों में वापस लौटने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं | ऐसे में यह पुनर्वास पैकेज और कुछ नहीं बस राज्य की असफलता को छिपाने के लिए एक चाल नज़र आती है |
7.      हत्या, बलात्कार, आगजनी, और लूट के मामलों में पुलिस की बेहद ढीली पड़ताल
फैक्ट-फाइंडिंग टीम को ज्ञात हुआ की पुलिस जान-बूझकर सबूत मिटाने और पड़ताल को विलंबित करने का प्रयास कर रही है | इस तरह से, सी आर पी सी के सेक्शन 167(2) में पड़ताल के लिए निर्धारित अधिकतम अवधि (90 दिन) निकलती जा रही है | और जघन्य अपराधों के दोषी बेल पर छूट रहे हैं | सिटीजन फार जस्टिस एंड पीस बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (याचिका क्र. 170 वर्ष 2013) के मामले में प्रार्थियों द्वारा दर्ज़ कराये गए अतिरिक्त शपथ-पत्र के अनुसार कम से कम 5 ऐसे दोषियों को बेल मिल भी चुकी है और अब इनको बिना कोर्ट वॉरेंट के गिरफ्तार करना असम्भव है | निम्नलिखित कम से दो ऐसे मामलों में पुलिस की संदिग्ध भूमिका स्पष्ट होती है |

डूंगर गाँव के मेहेरुदीन (पुत्र रफीक) का मामला ऐसा ही है | डूंगर गाँव मुज़फ्फरनगर ज़िले के फुगाना थाने में पड़ता है | मेहरुदीन का शव 8 सितम्बर को, निर्वस्त्र अवस्था में उन्हीं के गाँव के पवन जाट के घर में गले से लटका हुआ पाया गया था | ग्राम प्रधान और अन्य प्रभावशाली जाटों के दबाव में शव को गाँव के पास के कब्रिस्तान में दफ़नवा दिया गया था | आज मेहेरुदीन का परिवार कहता है की उनकी मृत्यु बीमारी के कारण हुई थी | परिवार अब शिविर छोड़कर कांधला शहर में रह रहा है | पर इसी गाँव के तीन लोग इस पूरी घटना के साक्षी थे और उनका वर्णन एफ़.आई.आर. में भी है | उनको जान की धमकियां भी आने लगी हैं | इनके बयान वीडियो पर रिकॉर्ड किये गए हैं और एफ़.आई.आर. के साथ जमा किये गए हैं | पुलिस अधिकारियों को एक अलग पत्र लिखकर शव का पोस्ट-मोर्टेम करने के लिए अनुरोध भी किया गया है, पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी है | विधि के अनुसार पुलिस को चाहिए था की वह वारदात के मौके पर एक पंचनामा बनाती और परिवार के अनुसार बताये गए मृत्यु के कारण को उसमें दर्ज करती | पर इस मामले कोई पंचनामा बनाया ही नहीं गया है | एफ़.आई.आर. दर्ज़ कराने के बाद भी पोस्ट-मोर्टेम के लिए शव को खोद कर निकला नहीं गया है |

एक अन्य मामले में भी पुलिस की दुष्टता सामने आती है | आमिर खान (पुत्र रैसुद्दीन) जो की अन्छाढ़ गाँव, थाना बिनौली, बाघपत ज़िले के निवासी थे, 8 सितम्बर को अपने माता, पिता, बीवी, और छोटे भाई के साथ अपना गाँव छोड़कर शेखपुरा में अपने रिश्तेदार के घर चले गए थे | 12 सितम्बर को परिवार से सलाह करके आमिर अपने गाँव वापस यह देखने के लिए गये कि हालात सामान्य हुए हैं या नहीं | जब आमिर देर शाम तक वापस नहीं लौटे, तब उनके माता, पिता और बीवी ने गाँव जाकर देखने का फैसला किया | 6 बजे के आस पास जब वे अपने घर पहुंचे तब उन्होंने आमिर के शव को छत से लटका हुआ पाया | उनकी चीखें सुनकर लोग इकठ्ठा हो गए और ग्राम प्रधान को बुलवाया गया | दो ग्राम निवासियों, संजीव और उसके पिता जगबीरा ने आमिर के परिवार को गाली देना शुरु कर दिया और आमिर द्वारा उधार लिए हुए 80,000 रूपए लौटाने को कहने लगे | ग्राम प्रधान समरपाल ने आमिर का शव दफ़नवा दिया और घोषित कर दिया कि किसी के भी पूछने पर यही कहा जाए कि आमिर की मृत्यु बीमारी से हुई थी | जाट परिवारों द्वारा पुलिस को बुलवाया गया और यही बताया गया | आमिर के परिवार द्वारा लगातार पोस्ट-मोर्टेम किये जाने के अनुरोध को नज़रंदाज़ कर दिया गया और उनसे जबरन अंगूठे के निशान ले लिए गए | इन तीन लोगों को फिर अपने ही घर में, उधार चुकाने के एवज में संजीव, जगबीरा और समरपाल द्वारा, बंधक बना कर रखा गया | जब 30 सितम्बर को उन्होंने अपने रिश्तेदारों की मदद से रूपए लौटाए तब उन्हें छोड़ा गया | इसके बाद परिवार जॉला गाँव के शिविर में चला गया, जो की बुद्धाना थाना, ज़िला मुज़फ्फरनगर में पड़ता है | परिवार ने फिर से पुलिस को पोस्ट-मोर्टेम करवाने के लिए कहा है पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है |
पी.यू.डी.आर. मांग करता है कि -
1.      पीड़ितों को शिविरों से जबरन निकालने की प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए | और पीड़ितों को तब तक राहत मुहैय्या कराई जाए जब तक उनके लिए एक स्थायी व्यवस्था न करा दी   जाए |
2.      एक कमिशन गठित किया जाए जो की विस्थापित लोगों की जानकारी, विस्थापन का कारण और उनकी संपत्ति का हिसाब बना सके | ताकि राहत और पुनर्वास के लिए पर्याप्त कदम लिए जा सकें |
3.      पुनर्वास पैकेज निष्पक्ष तौर पर दिया जाए | हर विवाहित जोड़े और हर अविवाहित वयस्क को एक अलग परिवार मानकर मुआवज़ा दिया जाए |
4.      पुनर्वास पैकेज के साथ जुड़ी नाजायज़ शर्तों को हटाया जाए | पीड़ितों की निजी और सामुदायिक संपत्ति जैसे कब्रिस्तान, मदरसे, ईदगाह आदि को दर्ज़ किया जाए और अन्य ग्रामवासियों द्वारा अनधिकृत कब्ज़े से सुरक्षित किया जाए |
5.      गवाहों और शिकायतकर्ताओं को मिल रहीं धमकियों को देखते हुए उन्हें सुरक्षा दी जाए |
6.      यह सुनिश्चित किया जाए कि दंगों की निष्पक्ष जांच हो और मुकद्दमें चलें | इसके लिए सभी मामले एक केन्द्रीय एजेंसी को सौंपें जाएँ |

Assistant Chemical Examiner along with 3 other officials of State Chemical Laboratory suspended from duty.



Chandigarh, 19th January:
The Department of Health & Family Welfare, Punjab here today passed the orders for the suspension of 4 of its employees working in the State Chemical Laboratory, Kharar on account of absence from duty. This was revealed here today by Sh Surjit Kumar Jyani, Health Minister, Punjab. He informed that those who have been suspended included Dr R.P Singh, Assistant Chemical Examiner, Sh Lekh Raj, MLT (Grade 2), Sh Rajesh Mishra, Junior Assistant and Sh Mohit Gugnani Class IV.

ਸਭ ਕੁਝ ਠੀਕ ਤਾਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਥਰੂਰ ਦੇ ਵਿਆਹ 'ਚ...


everything was not fair in Throor-Sunandas case.......
ਸਭ ਕੁਝ ਠੀਕ ਤਾਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਥਰੂਰ ਦੇ ਵਿਆਹ 'ਚ...
ਨਵੀਂ ਦਿੱਲੀ : ਪਾਕਿਸਤਾਨੀ ਮਹਿਲਾ ਪੱਤਰਕਾਰ ਮੇਹਰ ਤਰਾਰ ਸਬੰਧੀ ਥਰੂਰ ਜੋੜੇ ਵਿਚਕਾਰ ਵਿਵਾਦ ਅਤੇ ਤਣਾਅ ਹੁਣ ਸੁਨੰਦਾ ਪੁਸ਼ਕਰ ਦੀ ਅਚਾਨਕ ਮੌਤ ਦੀ ਚੱਲ ਰਹੀ ਜਾਂਚ 'ਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ। ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੀ ਮਹਿਲਾ ਪੱਤਕਰਾਰ ਨਾਲ ਥਰੂਰ ਦੀ ਨੇੜਤਾ ਸਬੰਧੀ ਘਰੇਲੂ ਤਣਾਅ ਦੀ ਗੱਲਬਾਤ ਕੇਂਦਰੀ ਮੰਤਰੀ ਅਤੇਪੱਤਰਕਾਰ ਵਿਚਕਾਰ ਉਸ ਕਥਿਤ ਈ-ਮੇਲ ਸੰਵਾਦ 'ਚ ਵੀ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੈ ਜੋ ਹੁਣ ਸਾਹਮਣੇ ਆਈ ਹੈ। ਏਨਾ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਪੁਸ਼ਕਰ ਨੇ ਵੀ ਕੁਝ ਆਖ਼ਰੀ ਟਵੀਟ 'ਚ ਆਪਣੇ ਕੋਲ ਮੌਜੂਦ ਮੇਹਰ ਦੇ ਈ-ਮੇਲ ਤੇ ਫੋਨ ਸੁਨੇਹੇ ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਝੁੱਠਾ ਦੱਸਿਆ ਸੀ। ਥਰੂਰ ਅਤੇ ਮੇਹਰ ਵਿਚਕਾਰਲਾ ਕਰੀਬ ਸੱਤ ਮਹੀਨੇ ਪਹਿਲਾਂ ਦਾ ਇਕ ਈ-ਮੇਲ ਸੰਵਾਦ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਦੋਵਾਂ ਦੀ ਨੇੜਤਾ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਈ-ਮੇਲ 'ਚ ਹਾਲਾਂਕਿ ਦੋਵਾਂ ਨੇ ਇਸ ਨੂੰ ਮਹਿਜ਼ ਦੋਸਤੀ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। 28 ਜੁਲਾਈ, 2013 ਦੇ ਇਸ ਈ-ਮੇਲ ਸੰਵਾਦ 'ਚ ਦੋਵੇਂ ਕਾਫੀ ਘੱਟ ਸਮੇਂ 'ਚ ਇਕ-ਦੂਸਰੇ ਦੇ ਕਾਫੀ ਨੇੜੇ ਆ ਗਏ ਸਨ। ਮੇਹਰ ਨੇ ਥਰੂਰ ਦੇ ਭੇਜੇ ਮੇਲ 'ਚ ਆਪਣੇ ਕਾਰਨ ਕੇਂਦਰੀ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਪਰਿਵਾਰ 'ਚ ਕਲੇਸ਼ 'ਤੇ ਖੇਦ ਪ੍ਰਗਟਾਉਣ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਸਭ ਕੁਝ ਠੀਕ ਹੋਣ ਦੀਆਂ ਸ਼ੁਭਕਾਮਨਾਵਾਂ ਵੀ ਦਿੱਤੀਆਂ ਸਨ। ਨਾਲ ਹੀ ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ 'ਚ ਥਰੂਰ ਦੀ ਮੌਜੂਦਗੀ ਲਈ ਸ਼ੁਕਰੀਆ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਕਿਹਾ- 'ਅਸੀਂ ਲਾਂਗ ਡਿਸਟੈਂਸ ਦੋਸਤ ਹੀ ਸਹੀ...।' ਮੇਹਰ ਦੇ ਈ-ਮੇਲ ਦੇ ਜਵਾਬ 'ਚ ਥਰੂਰ ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਤਸਦੀਕ ਕੀਤੀ ਸੀ ਕਿ ਸੁਨੰਦਾ ਪਾਕਿ ਮਹਿਲਾ ਪੱਤਰਕਾਰ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਗੱਲਬਾਤ ਸਬੰਧੀ ਦੁਖੀ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ 'ਚ, 'ਕੁਝ ਲੋਕ ਇਹ ਨਹੀਂ ਸਮਝ ਸਕਦੇ ਹਨ ਕਿ ਅਜਿਹੇ ਸਬੰਧੀ ਵੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ।
ਮੌਤ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਰਾਤ ਭਰ ਜਾਗੀ ਸੁਨੰਦਾ
ਸ਼ੁੱਕਰਵਾਰ ਦੇਰ ਸ਼ਾਮ ਸੁਨੰਦਾ ਪੁਸ਼ਕਰ ਦੀ ਮੌਤ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਆਈ ਪਰ ਸੋਸ਼ਲ ਨੈਟਵਰਕਿੰਗ ਟਵਿਟਰ 'ਤੇ ਸੁਨੰਦਾ ਲਗਪਗ ਪੂਰੀ ਰਾਤ ਸਰਗਰਮ ਰਹੇ। ਉਧਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਟਵਿਟਰ ਸੁਨੇਹਿਆਂ 'ਚ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰਕ ਜੀਵਨ ਸਬੰਧੀ ਉਠੇ ਵਿਵਾਦ ਦਾ ਦਰਦ ਸਾਫ ਨਜ਼ਰ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਇਥੋਂ ਤਕ ਕਿ 17 ਜਨਵਰੀ 2014 ਨੂੰ ਦੇਰ ਰਾਤ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਅਤੇ ਪਾਕਿ ਮਹਿਲਾ ਪੱਤਰਕਾਰ ਮੇਹਰ ਤਰਾਰ ਵਿਚਕਾਰ ਵੀ ਸੁਨੇਹੇਬਾਜ਼ੀ ਹੋਈ। ਮੇਹਰ ਨੇ ਵੀਰਵਾਰ ਅਤੇ ਸ਼ੁੱਕਰਵਾਰ ਨੂੰ ਅੱਧੀ ਰਾਤ ਕਰੀਬ 2 ਵਜ ਕੇ 10 ਮਿੰਟ 'ਤੇ ਸੁਨੰਦਾ ਦੇ ਟਵੀਟ 'ਤੇ ਜਵਾਬ 'ਚ ਲਿਖਿਆ- 'ਜਾਣ ਕੇ ਚੰਗਾ ਲੱਗਾ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਟੀ। ਹੁਣ ਥੋੜਾ ਆਰਾਮ ਕਰ ਲਓ। ਗੌਡ ਬਲੈਸ।' ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸੁਨੰਦਾ ਨੇ 2:08 ਵਜੇ ਲਿਖੇ ਸੁਨੇਹੇ 'ਚ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਮੈਂ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਪਤੀ ਖੁਸ਼ ਹਾਂ। ਕੋਈ ਮੇਹਰ ਮੈਨੂੰ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੀ ਪਰ ਟੀਵੀ 'ਤੇ ਉਸ ਨੇ ਜੋ ਝੂਠ ਕਿਹਾ ਉਸ ਸਬੰਧੀ ਮੈਂ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਹਾਂ। ਰਾਤ ਇਕ ਵੇਜ ਉਨ੍ਹਾਂ ਜਨਤਕ ਹੋਏ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰਕ ਵਿਵਾਦ 'ਤੇ ਇਕ ਟੀਵੀ ਸ਼ੋਅ ਦਾ ਹਵਾਲਾ ਦਿੰਦਿਆਂ ਟਵੀਟ ਕੀਤਾ, 'ਮੈਂ ਸ਼ੋ ਵੇਖਿਆ ਅਤੇ ਮੇਹਰ ਨੇ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਝੂਠ ਬੋਲਿਆ। ਮੇਰੇ ਪਤੀ ਨੂੰ ਭੇਜੇ ਉਸ ਦੇ ਸਾਰੇ ਈਮੇਲ-ਬੀਬੀਐਮ (ਬਲੈਕਬੇਰੀ ਮੈਸਜ) ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਹਨ। ਮੈ ਝੂਠ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦੀ।' ਸਵੇਰੇ ਕਰੀਬ ਪੌਣੇ ਪੰਜ ਵਜੇ ਤਕ ਸੁਨੰਦਾ ਟਵੀਟ 'ਤੇ ਸਰਗਰਮ ਰਹੀ। ਇਕ ਟਵੀਟਰ ਫਾਲੋਅਰ ਵੱਲੋਂ ਟੀਵੀ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ 'ਚ ਮੇਹਰ ਅਤੇ ਸ਼ਸ਼ੀ ਥਰੂਰ ਦੇ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਆਉਣ ਦੇ ਪ੍ਰਸਤਾਵ 'ਤੇ ਆਉਣ ਕਿਹਾ ਕਿ ਇਹ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ। ਰਾਤ ਭਰ ਜਾਗਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਿਹਾੜਾ ਸਵੇਰੇ ਸੁੱਤੀ ਸੁਨੰਦਾ ਮੁੜ ਉੱਠ ਨਹੀਂ ਸੀ।

ਦਿੱਲੀ ਪੁਲੀਸ ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਸਰਕਾਰ ਅਧੀਨ ਲਿਆਂਦਾ ਜਾਵੇ- ਕੇਜਰੀਵਾਲ



  • ਨਵੀਂ ਦਿੱਲੀ,
    ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਅਰਵਿੰਦ ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਨੇ ਅੱਜ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਕਿ ਦਿੱਲੀ ਪੁਲੀਸ ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਸਰਕਾਰ ਅਧੀਨ ਲਿਆਂਦਾ ਜਾਵੇ ਕਿਉਂਕਿ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦੇ ਹਰ ਜੁਰਮ ਲਈ ਦਿੱਲੀ ਵਾਸੀ ਪੁਲੀਸ ਤੋਂ ਜਵਾਬ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਕੈਬਨਿਟ ਸਾਥੀਆਂ ਸਮੇਤ ਉਪ ਰਾਜਪਾਲ ਨੂੰ ਮਿਲ ਕੇ ਚਾਰ ਪੁਲੀਸ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਮੁਅੱਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ। ਇਹ ਮੰਗ ਨਾ ਮੰਨੇ ਜਾਣ ’ਤੇ ‘ਆਪ’ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਸੋਮਵਾਰ ਨੂੰ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਬਾਹਰ ਧਰਨਾ ਦੇਣ ਦੀ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ ਹੈ।
    ਅੱਜ ਇੱਥੇ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਸੁਸ਼ੀਲ ਕੁਮਾਰ ਸ਼ਿੰਦੇ ਨਾਲ ਮੁਲਾਕਾਤ ਮਗਰੋਂ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਕਰਦਿਆਂ ਸ੍ਰੀ ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘‘ਜਦੋਂ ਵੀ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਜੁਰਮ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਲੋਕ ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਆ ਕੇ ਜਵਾਬ ਮੰਗਦੇ ਹਨ। ਉਹ (ਕੇਂਦਰੀ) ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਕੋਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੇ। ਇਸ ਕਰਕੇ ਦਿੱਲੀ ਪੁਲੀਸ ਵਿਭਾਗ ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਸਰਕਾਰ ਹਵਾਲੇ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ।’’
    ਦਿੱਲੀ ਪੁਲੀਸ ਇਸ ਵੇਲੇ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰਾਲੇ ਦੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਕੰਟਰੋਲ ਹੇਠ ਹੈ। ਸ੍ਰੀ ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਨਾਲ ਕੈਬਨਿਟ ਮੰਤਰੀ ਮਨੀਸ਼ ਸਿਸੋਦੀਆ, ਸੋਮਨਾਥ ਭਾਰਤੀ ਅਤੇ ਰਾਖੀ ਬਿਰਲਾ ਵੀ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਗਏ।
    ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਚਾਰ ਪੁਲੀਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਨੂੰ ਮੁਅੱਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਪੁਲੀਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ’ਤੇ ਤਿੰਨ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਮਾਮਲਿਆਂ ਸਬੰਧੀ ਆਪਣੀ ਡਿਊਟੀ ਵਿੱਚ ਲਾਪ੍ਰਵਾਹੀ ਵਰਤਣ ਦੇ ਦੋਸ਼ ਲੱਗੇ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਔਰਤ ਨਾਲ ਸਮੂਹਿਕ ਬਲਾਤਕਾਰ, ਮਾਲਵੀਆ ਨਗਰ ਵਿੱਚ ਸਰਗਰਮ ਨਸ਼ਿਆਂ ਦਾ ਗਰੋਹ ਅਤੇ ਪੱਛਮੀ ਦਿੱਲੀ ਵਿੱਚ ਦਾਜ ਸਬੰਧੀ ਔਰਤ ਨੂੰ ਜਿੰਦਾ ਜਲਾਉਣ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ। ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਭਰੋਸਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਮੰਗਾਂ ਬਾਰੇ ਵਿਚਾਰ ਕਰਨਗੇ ਅਤੇ ਕੁਝ ਦਿਨਾਂ ਬਾਅਦ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦੱਸਣਗੇ। ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਦੀ ਮੀਟਿੰਗ ਮਗਰੋਂ ਦਿੱਲੀ ਪੁਲੀਸ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਬੀ।ਐਸ। ਬਾਸੀ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਨੂੰ ਮਿਲੇ।
    ਪਹਿਲਾਂ ਸਵੇਰੇ ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੈਬਨਿਟ ਸਾਥੀਆਂ ਰਾਖੀ ਬਿਰਲਾ, ਸੋਮਨਾਥ ਭਾਰਤੀ ਅਤੇ ਮਨੀਸ਼ ਸਿਸੋਦੀਆ ਨੇ ਉਪ ਰਾਜਪਾਲ ਨਜੀਬ ਜੰਗ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ ਵਿਖੇ ਮੁਲਾਕਾਤ ਕੀਤੀ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਦਿੱਲੀ ਪੁਲੀਸ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਬੀ ਐਸ ਬਾਸੀ ਅਤੇ ਚਾਰ ਪੁਲੀਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੁਅੱਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ, ਵੀ ਹਾਜ਼ਰ ਸਨ।
    ਕਰੀਬ ਇੱਕ ਘੰਟਾ ਚੱਲੀ ਇਸ ਮੀਟਿੰਗ ਦੌਰਾਨ ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਅਤੇ ਮੰਤਰੀਆਂ ਨੇ ਰਾਜਧਾਨੀ ਵਿੱਚ ਔਰਤਾਂ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦਾ ਮੁੱਦਾ ਉਠਾਇਆ ਅਤੇ ਤਿੰਨ ਐਸਐਚਓਜ਼ ਤੇ ਇੱਕ ਏਸੀਪੀ ਨੂੰ ਮੁਅੱਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਪੁਲੀਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ’ਤੇ ਡਿਊਟੀ ਵਿੱਚ ਲਾਪ੍ਰਵਾਹੀ ਵਰਤਣ ਅਤੇ ਸਹਿਯੋਗ ਨਾ ਦੇਣ ਦੇ ਦੋਸ਼ ਲੱਗੇ ਹਨ।
    ਉਪ ਰਾਜਪਾਲ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕੇਸਾਂ ਦੀ ਉੱਚ ਪੱਧਰੀ ਜਾਂਚ ਦੇ ਆਦੇਸ਼ ਦਿੱਤੇ ਪਰ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਬਾਸੀ ਵੱਲੋਂ ਮੁਅੱਤਲੀ ਦੀ ਮੰਗ ਮੰਨਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ।
    ਇਸੇ ਦੌਰਾਨ ਆਮ ਆਦਮੀ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ ਹੈ ਕਿ ਜੇਕਰ ਪੁਲੀਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਯੋਗ ਕਾਰਵਾਈ ਨਾ ਕੀਤੀ ਗਈ ਤਾਂ ਉਹ ਸੋਮਵਾਰ ਨੂੰ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਦਫਤਰ ਦੇ ਬਾਹਰ ਧਰਨਾ ਦੇਵੇਗੀ।  ਕੈਬਨਿਟ ਮੰਤਰੀ ਮਨੀਸ਼ ਸਿਸੋਦੀਆ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘‘ਜੇਕਰ ਪੁਲੀਸ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਨੂੰ ਮੁਅੱਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਨਾ ਮੰਨੀ ਗਈ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਸੋਮਵਾਰ ਨੂੰ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਦਫਤਰ ਦੇ ਬਾਹਰ ਧਰਨਾ ਦੇਵਾਂਗੇ।’’

    ਇਸ ਸਾਲ ਕੰਮ ਦੌਰਾਨ ਮਾਰੇ ਗਏ 70 ਪੱਤਰਕਾਰ



  • ਨਿਊਯਾਰਕ-ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਨਾਲ ਜੁੜੀ ਇਕ ਸਮਿਤੀ ਅਨੁਸਾਰ ਇਸ ਸਾਲ ਦੁਨੀਆਂ ਭਰ 'ਚ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ 70 ਪੱਤਰਕਾਰ ਕੰਮ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਮਾਰੇ ਗਏ। ਇਸ 'ਚ ਸੀਰੀਆ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ ਯੁੱਧ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟਿੰਗ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਮਾਰੇ ਗਏ 29 ਪੱਤਰਕਾਰ ਅਤੇ ਇਰਾਕ 'ਚ ਮਾਰੇ ਗਏ 10 ਪੱਤਰਕਾਰ ਵੀ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹਨ। 
    'ਕਮੇਟੀ ਟੂ ਪ੍ਰੋਟੈਕਟ ਜਰਨਲਿਸਟਸ' ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਸੀਰੀਆ 'ਚ ਮਾਰੇ ਗਏ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ 'ਚ ਆਪਣੇ ਗ੍ਰਹਿ ਨਗਰਾਂ 'ਚ ਚੱਲ ਰਹੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟਿੰਗ ਕਰ ਰਹੇ ਕਈ ਨਾਗਰਿਕ ਪੱਤਰਕਾਰ, ਸਰਕਾਰ ਜਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਦੁਆਰਾ ਆਗਿਆ ਪ੍ਰਾਪਤ ਮੀਡੀਆ ਸੰਗਠਨਾਂ ਲਈ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੇ ਪ੍ਰਸਾਰਕ ਅਤੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਪ੍ਰੈੱਸ ਦੇ ਕੁਝ ਪੱਤਰਕਾਰ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹਨ। ਮਾਰੇ ਗਏ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਪ੍ਰੈੱਸ ਦੇ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ 'ਚ ਅਲ ਜਜ਼ੀਰਾ ਦੇ ਰਿਪੋਰਟਰ ਮੁਹੰਮਦ ਅਲ ਮੇਸਲਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਇਕ ਬੰਦੂਕਧਾਰੀ ਨੇ ਗੋਲੀ ਮਾਰ ਦਿੱਤੀ ਸੀ। ਮਿਸਰ 'ਚ 6 ਪੱਤਰਕਾਰ ਮਾਰੇ ਗਏ। ਇਨ੍ਹਾਂ 'ਚੋਂ ਅੱਧੇ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਪੱਤਰਕਾਰ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਮੁਹੰਮਦ ਮੁਰਸੀ ਨੂੰ ਸੱਤਾ ਤੋਂ ਹਟਾਉਣ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰ ਰਹੇ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨਕਾਰੀਆਂ 'ਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਬਲਾਂ ਦੁਆਰਾ 14 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਕੀਤੀ ਗਈ ਕਾਰਵਾਈ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟਿੰਗ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਮਾਰੇ ਗਏ। 
    ਸਮਿਤੀ ਦੇ ਉਪ-ਨਿਰਦੇਸ਼ਕ ਰੂਪਰਟ ਮੈਹੋਨੇ ਨੇ ਇਕ ਬਿਆਨ 'ਚ ਕਿਹਾ ਕਿ ਪੱਛਮੀ ਏਸ਼ੀਆ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਲਈ ਮੌਤ ਦਾ ਮੈਦਾਨ ਬਣ ਗਿਆ ਜਿਥੇ ਕੁਝ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਕੰਮ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਮਾਰੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਦੀ ਸੰਖਿਆ 'ਚ ਕਮੀ ਆਈ ਉਥੇ ਹੀ ਸੀਰੀਆ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ ਯੁੱਧ ਅਤੇ ਇਰਾਕ 'ਚ ਦੁਬਾਰਾ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਏ ਸੰਪਰਦਾਇਕ ਹਮਲਿਆਂ ਨੇ ਨਿਰਾਸ਼ਾਜਨਕ ਰੂਪ ਨਾਲ ਇਥੇ ਸੰਖਿਆ ਵਧਾ ਦਿੱਤੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅੰਤਰਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸਮੁਦਾਏ ਨੂੰ ਸਾਰੀਆਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਅਤੇ ਹਥਿਆਰਬੰਦ ਸਮੂਹਾਂ ਨਾਲ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਦੇ ਨਾਗਰਿਕ ਦੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਸਨਮਾਨ ਕਰਨ ਅਤੇ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਦੇ ਹੱਤਿਆਰਿਆਂ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ ਦਿਵਾਉਣ ਲਈ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਨਿਊਯਾਰਕ ਸਥਿਤ ਇਸ ਸਮਿਤੀ ਨੇ 1992 ਤੋਂ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸਾਰਕਾਂ ਦੀਆਂ ਮੌਤਾਂ 'ਤੇ ਨਜ਼ਰ ਰੱਖੀ ਹੋਈ ਹੈ।

    ਬੱਬੀ ਬਾਦਲ ਵੱਲੋਂ ਲੋਹੜੀ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦੌਰਾਨ ਹੋਣਹਾਰ ਵਿਦਿਆਰਥਣਾਂ ਦਾ ਸਨਮਾਨ

    ਅਜੀਤਗੜ੍ਹ,  -ਲੋਹੜੀ ਦੇ ਸ਼ੁਭ ਦਿਹਾੜੇ 'ਤੇ ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਐਜੂਕੇਸ਼ਨ ਸੁਸਾਇਟੀ ਵੱਲੋਂ ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਕਾਲਜ (ਲੜਕੀਆਂ) ਮਾਣਕਪੁਰ ਵਿਖੇ ਰੰਗਾਰੰਗ ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦੌਰਾਨ ਮੁੱਖ ਮਹਿਮਾਨ ਦੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚੇ ਯੂਥ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੇ ਕੌਮੀ ਮੁੱਖ ਬੁਲਾਰੇ ਹਰਸੁਖਇੰਦਰ ਸਿੰਘ ਬੱਬੀ ਬਾਦਲ ਵੱਲੋਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ 'ਚ ਨਾਮਣਾ ਖੱਟਣ ਵਾਲੀਆਂ ਵਿਦਿਆਰਥਣਾਂ ਦਾ ਸਨਮਾਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ | ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਮਾਤਾ ਗੁਜਰੀ ਐਜੂਕੇਸ਼ਨ ਸੁਸਾਇਟੀ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਇਹ ਉਪਰਾਲਾ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸਲਾਹੁਣਯੋਗ ਹੈ | ਇਸ ਮੌਕੇ ਚੇਅਰਮੈਨ ਜਤਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਰੋਮੀ, ਪਿ੍ੰ. ਸਰਬਜੀਤ ਕੌਰ, ਸੂਬੇਦਾਰ ਬਚਨ ਸਿੰਘ, ਜੋਗਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਸਰਪੰਚ, ਹਰਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਸਰਪੰਚ, ਗੁਰਚਰਨ ਸਿੰਘ ਅਬਰਾਵਾਂ ਸੀਨੀ. ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ, ਅਮਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਸਰਕਲ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮਾਣਕਪੁਰ, ਬਹਾਦਰ ਸਿੰਘ ਸਰਪੰਚ, ਨਗਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਵੀਲਾ, ਜਗਤਾਰ ਸਿੰਘ ਘੜੂੰਆਂ ਨਿੱਜੀ ਸਕੱਤਰ ਬੱਬੀ ਬਾਦਲ, ਸੁੱਖੀ ਬੱਲੋਮਾਜਰਾ ਆਦਿ ਹਾਜ਼ਰ ਸਨ |

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