Saturday, February 21, 2015

स्वाईन फ्लू देश में सरकार की लापरवाही का नतीजा है. काफ़ी समय पहले ही इस ख़तरनाक बीमारी का पता देश की सरकार को अफरिका में इसका पहला कैस सामने आने पर ही चल गया था .तब जरूरत थी देश की सरकार को इसको रोकने के लिए ऐहतियात की जिसमें सरकार पूरी तरह गंभीर ना होकर लापरवाह बनी रही ओर आज देश का कोई कोना ऐसा नहीं जहां इसको लेकर दहशत ना हो ओर आज भी देश की सरकार इसके लिए गंभीर नहीं है.

हर दिल अजीज अटल बिहारी वाजपेयी

भारत के सर्वाधिक करिश्माई नेताओं में शुमार अटल बिहारी वाजपेयी का देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसे विशाल व्यक्तित्व वाले राजनेता के रूप में सम्मान किया जाता है जिनकी व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता है और जिन्होंने तमाम अवरोधों को तोड़ते हुए 90 के दशक में राजनीति के मुख्य मंच पर भाजपा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे वाजपेयी के व्यक्तित्व का ही आकर्षण कहा जाएगा कि नए सहयोगी दल उस भाजपा के साथ जुड़ते गए जिसे अपने दक्षिणपंथी झुकाव के कारण उस जमाने, खासतौर से बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राजनीतिक रूप से ‘अछूत’ माना जाता था।
अपनी वाणी के ओज और ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत-पाकिस्तान मतभेदों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का श्रेय दिया जाता है। अपने इन ठोस कदमों के साथ वह भाजपा के ‘राष्ट्रवादी राजनीतिक एजेंडे’ से परे जाकर एक व्यापक फलक के राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। कांग्रेस के बाहर देश के सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने वाले वाजपेयी को अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है। उनके आलोचक हालांकि उन्हें आरएसएस का ऐसा ‘‘मुखौटा’’ बताते रहे हैं जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिंदुवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती है। 1999 की वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा की उनकी ही पार्टी के ‘कट्टरवादी नेताओं’ ने आलोचना की थी लेकिन वह बस पर सवार होकर किसी विजेता की तरह लाहौर पहुंचे। वाजपेयी की इस राजनयिक सफलता को भारत-पाक संबंधों में एक नए युग की शुरूआत की संज्ञा देकर सराहा गया। लेकिन यह दूसरी बात है कि पाकिस्तानी सेना ने गुपचुप अभियान के जरिए अपने सैनिकों की कारगिल में घुसपैठ करायी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच छिड़े संघर्ष में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी।
भाजपा के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने लेकिन संख्या बल में मात खाने से उनकी सरकार महज 13 दिन ही चल सकी। आंकड़ों ने एक बार फिर वाजपेयी के साथ लुकाछिपी का खेल खेला और स्थिर बहुमत नहीं होने के कारण 13 महीने बाद 1999 की शुरूआत में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई। अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता द्वारा केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण वाजपेयी सरकार धराशायी हो गयी। लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी पिछली बार के मुकाबले एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। गठबंधन राजनीति की मजबूरियां ही कहिए कि भाजपा को अपने मूल से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेलना पड़ा। इन्हीं मजबूरियों के चलते जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे उसके चिर प्रतीक्षित मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर जवाहरलाल नेहरू की शैली और स्तर के नेता के रूप में सम्मान पाने वाले वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में 1998.99 का कार्यकाल साहसिक और दृढ़निश्चयी फैसलों के वर्ष के रूप में जाना जाता है। इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में श्रृंखलाबद्ध परमाणु परीक्षण किए। वाजपेयी के करीबी लोगों का कहना है कि उनका मिशन पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारना था और इसके बीज उन्होंने 70 के दशक में मोरारजी देसाई की सरकार में बतौर विदेश मंत्री रहते हुए ही रोपे थे। लाहौर शांति उपायों के विफल रहने के बाद वर्ष 2001 में वाजपेयी ने जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ ऐतिहासिक आगरा शिखर वार्ता की एक और पहल की लेकिन वह भी विफल रही।
छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना वाजपेयी के लिए इस बात की अग्नि परीक्षा थी कि धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर वह कहां खड़े हैं। उस समय वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। वाजपेयी के विश्वासपात्र सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी और अधिकतर भाजपा नेताओं ने विध्वंस का समर्थन किया लेकिन वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की। उनकी निजी निष्ठा पर कभी गंभीर सवाल नहीं किए गए लेकिन हथियार रिश्वत कांडों ने उनकी सरकार में भ्रष्टाचार को उजागर किया और ऐसा वक्त भी आया जब उनके फैसलों पर शकांए जाहिर की गयीं।
वाजपेयी एक जाने माने कवि भी हैं और उनके पार्टी सहयोगी अक्सर उनकी रचनाओं को उद्धृत करते हैं। 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में उनका जन्म हुआ। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी हैं। वाजपेयी का संसदीय अनुभव पांच दशकों से भी अधिक का विस्तार लिए हुए है। वह पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन का विरोध करने के लिए किशोरावस्था में वाजपेयी कुछ समय के लिए जेल गए लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने कोई मुख्य भूमिका अदा नहीं की। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जन संघ का साथ पकड़ने से पहले वाजपेयी कुछ समय तक साम्यवाद के संपर्क में भी आए। बाद में दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ाव के बाद जनसंघ और तत्पश्चात भाजपा के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों की शुरूआत हुई। 1950 के दशक की शुरूआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बाद में उन्होंने आरएसएस में अपनी राजनीतिक जड़ें जमायीं और भाजपा की उदारवादी आवाज बनकर उभरे।
राजनीति में वाजपेयी की शुरूआत 1942.45 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई थी। उन्होंने कम्युनिस्ट के रूप में शुरूआत की लेकिन हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता के लिए साम्यवाद को छोड़ दिया। संघ को भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी माना जाता है। इसी दौरान वाजपेयी भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी के करीबी अनुयायी और सहयोगी बन गए। जब मुखर्जी ने 1953 में कश्मीर में राज्य में प्रवेश के लिए परमिट लेने की व्यवस्था के खिलाफ आमरण अनशन किया तो वाजपेयी उनके साथ थे। मुखर्जी ने परमिट व्यवस्था को कश्मीर की यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों के साथ ‘‘तुच्छ’’ व्यवहार करार दिया था। साथ ही उन्होंने मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने के खिलाफ भी आमरण अनशन किया था। मुखर्जी के अनशन और विरोध की परिणति परमिट व्यवस्था समाप्त करने और कश्मीर के भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया तेज किए जाने के रूप में हुई। लेकिन कई सप्ताह की जेलबंदी, बीमारी और कमजोरी के चलते मुखर्जी का निधन हो गया। इन सारी घटनाओं ने युवा वाजपेयी के मन पर गहरी छाप छोड़ी। मुखर्जी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए वाजपेयी ने 1957 में अपना पहला चुनाव लड़ा और जीता। भारतीय जनसंघ के नेता के रूप में उन्होंने इसके राजनीतिक दायरे, संगठन और एजेंडे का विस्तार किया। अपनी युवावस्था के बावजूद वाजपेयी जल्द ही विपक्ष में एक सम्मानित हस्ती बन गए जिनकी तर्कशक्ति और बुद्धिमत्ता के उनके विरोधी भी कायल होने लगे। उनकी व्यापक अपील ने उभरते राष्ट्रवादी सांस्कृतिक आंदोलन को सम्मान, पहचान और स्वीकार्यता दिलायी।

सपनों को हकीकत में जीने का तजुर्बा यानी सिनेमेटोग्राफी

सिनेमेटोग्राफी में कॅरियर बनाना यानी सपनों की हकीकत को बयां करने जैसा ही है। वर्तमान समय में यह क्षेत्र काफी विस्तार के साथ बढ़ रहा है।
फिल्म और फोटोग्राफी के जानकार लोगों का मानना है कि एक सिनेमेटोग्राफर की जरूरत फिल्म इंडस्ट्री से लेकर टीवी चैनलों और विज्ञापन फिल्मों के निर्माण कार्यों में खासतौर से होती है। यही नहीं, न्यूज चैनलों में इनकी नियुक्तियां विभिन्न शहरों में बड़ी संख्या की जाती हैं।
फिल्मी दुनिया के ग्लैमर, बेशुमार दौलत और शोहरत पाने वाले मुकाम तक यदि आप पहुंचना चाहते हैं तो इस प्रोफेशन में कॅरियर बनाना वहां तक पहुंचने में काफी मददगार साबित होगा। जरूरत है तो बस दृश्यों और तकनीक की अच्छी समझ की, किसी भी चलचित्र (फिल्म) में सिनेमेटोग्राफर अपनी तकनीकी कुशलता से उस फिल्म में जान डाल देता है। कल्पनाशील (क्रियेटिव) व्यक्ति इस क्षेत्र में बेहतर और काफी बेहतर कर सकने की काबिलियत रखते हैं। इन्हीं में एक शायद आप भी हों।
एक अच्छा सिनेमेटोग्राफर कहानी के हिसाब से सीन और डायरेक्टर के अनुसार कैमरा और लाइटिंग को व्यवस्थित करने का काम करता है। उसे विजुलाइजेशन और लाइटिंग की सटीक जानकारी होती है और उसके पास व्यावसायिक तकनीकी ज्ञान होता है।
सिनेमेटोग्राफी का सबसे बेहतर उदाहरण फिल्मों में शूट किए गए स्टंट सीन हैं जोकि आज हर फिल्म में मौजूद रहते हैं। सिनेमेटोग्राफर को फिक्शन, एडवरटाइजिंग और डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए कैमरे का कैसे प्रयोग करना है, इसकी पूरी जानकारी होती है।
ऐसे बनें सिनेमेटोग्राफर

कई संस्थान सिनेमेटोग्राफी के पीजी और शार्ट टर्म कोर्स कराते हैं। आप डिप्लोमा और शार्ट टर्म दोनों ही तरह के कोर्स कर सकते हैं। सिनेमेटोग्राफी पढ़ाने वाले इंस्टीट्यूट में स्टूडेंट को पढ़ाई के दौरान कैमरा हैडलिंग, कैमरा शॅाट, एंगल, मूवमेंट, लाईटिंग और कंपोजीशन के अलावा टेक्निकल जानकारी दी जाती है।
इसके लिए किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से 12वीं या उसके समकक्ष होना जरूरी है। ग्रेजुएशन के बाद भी आप आवेदन कर सकते हैं।
आमदनी भरपूर
कोर्स पूरा होने के बाद आपको फिल्म और सीरियल में काम मिल सकता है। वहीं एडवरटाइजिंग और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए भी आप काम कर सकते हैं। शुरूआती दौर में एक सिनेमेटोग्राफर को 15 से 20 हजार रूपए प्रति माह वेतन मिलता है, जो कि अनुभव बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता जाता है।
यहां बन सकते हैं प्रोफेशनल सिनेमेटोग्राफर
सिनेमेटोग्राफी की ट्रेनिंग देने वाले प्रमुख संस्थानों में फिल्म एंड ट्रेनिंग इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया, पुणे। सत्यजित रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया, कोलकाता। एल.वी. प्रसाद फिल्म एंड टेलीविजन एकेडेमी, चेन्नई। फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटय़ूट ऑफ तमिलनाडु, चेन्नई आदि का नाम लिया जा सकता है। अमूमन ग्रेजुएशन के बाद ही इस कोर्स में एडमिशन मिलता है। हालांकि प्राइवेट इंस्टीटय़ूट में 10+2 के बाद कैमरामैन का कोर्स संभव है।
इनके अलावा आप फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया-पूना, सत्यजीत रॉय फिल्म इंस्टीट्यूट-मुंबई, सेंट्रल ऑफ रिसर्च इन आर्ट ऑफ फिल्म ऐंड टेलीविजन-दिल्ली, एशियन एकादमी ऑफ फिल्म ऐंड टेलीविजन-नोएडा, चेन्नई फिल्म स्कूल-तमिलनाडु में भी बेहतर सिनेमेटोग्राफर बनने के लिए ज्ञान अर्जित कर सकते हैं।

मोहन भागवत पांच दिवसीय राजस्थान यात्रापर

भरतपुर : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत पांच दिवसीय राजस्थान यात्रापर आज भरतपुर पहुंचे. आरएसएस के प्रवक्ता ने बताया कि मोहन भागवत चार दिन के भरतपुर प्रवास के दौरान संगठनात्मक बैठकों समेत तीन सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे. जिला पुलिस अधीक्षक राहुल प्रकाश के अनुसार भागवत के लिये बुलेट प्रूफ कार मंगाई गई है. अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक केसर सिंह को उनकी सुरक्षा का प्रभार सौंपा गया है. सीआईएसएफ के कमाण्डो आरएसएस प्रमुख की सुरक्षा के आन्तरिक घेरे को संभालेंगे जबकि स्थानीय पुलिस बाह्य सुरक्षा देखेगी. आरएसएस प्रमुख चार दिवसीय प्रवास के दौरान यहां के संभाग प्रमुख महेन्द्रसिंह मग्गो के श्यामाप्रसाद मुखर्जी नगर स्थित मकान में रुकेंगे। आरएसएस प्रमुख आज प्रात: सात बज कर 50 मिनट पर वाराणसी जोधपुर ट्रेन से भरतपुर पहुंचने के बाद सीधे इस आवास के लिये रवाना हो गये.

एसपी राहुल प्रकाश से प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरएसएस प्रमुख 20 फरवरी को प्रात: 11 बजे यहां केशव नगर स्थित आदर्श विद्या मंदिर में आरएसएस के सम्मेलन में शामिल होने के बाद खानुआ गांव में राणासांगा स्मारक पर आयोजित सांस्कृतिक समारोह में व्याख्यान देंगे। 21 फरवरी को वह संघ के अनुषांगिक संगठनों के समन्वयक शिविर को सम्बोधित करेंगे तथा 22 फरवरी को यहां किला स्थित महाराजा सूरजमल स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद आरएसएस के नवचैतन्य कार्यक्रम में मौजूद स्वयंसेवकों को सम्बोधित करेंगे। 23 फरवरी को वह गांव बङोरा स्थित ‘अपना घर’ नामक स्वयंसेवी संस्था के एक कार्यक्रम में शिरकत करने के पश्चात शाम को जयपुर के लिए रवाना होंगे.

वायु प्रदूषण से ज्यादातर भारतीयों की हो जाती है तीन साल पहले ही मौत

शिकागो : भारत दुनिया के कुछ उन देशों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण है और इसके चलते ज्यादातर भारतीय समय से तीन साल से पहले ही मर जाते हैं. भारत में वायु प्रदूषण के भयावह दुष्प्रभाव की बात यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अर्थशास्त्रियों के अध्ययन में कही गई है. यह अध्ययन रिपोर्ट इस सप्ताह के 'इकानॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली' में प्रकाशित हुई है. उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को सर्वाधिक वायु प्रदूषण वाले देशों की सूची में रखा है.
अध्ययन में कहा गया है कि भारत की आधी आबादी-66 करोड लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहां सूक्ष्म कण पदार्थ (पार्टिकुलेट मैटर) प्रदूषण भारत के सुरक्षित मानकों से उपर है. इसमें कहा गया है कि यदि भारत अपने वायु मानकों को पूरा करने के लिए इस आंकडे को उलट देता है तो वे उन 66 करोड लोगों को अपने जीवन के करीब 3.2 वर्ष बढ जाएंगे. अध्ययन में कहा गया है कि भारतीय वायु मानकों के पालन से 2.1 अरब जीवन-वर्ष बचेंगे.
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में 'एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट' (एपिक) के निदेशक माइकल ग्रीन स्टोन ने कहा, 'भारत का ध्यान आवश्यक रूप से वृद्धि पर है. यद्यपि लंबे समय से, वृद्धि की पारंपरिक परिभाषा ने वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों की अनदेखी की है.' 'यह अध्ययन दिखाता है कि वायु प्रदूषण लोगों की समय पूर्व मौत का कारण बनकर वृद्धि को धीमी बना रहा है. अन्य अध्ययनों में भी दर्शाया गया है कि वायु प्रदूषण उत्पादकता घटाता है, बीमारी के दिनों को बढाता है और स्वास्थ्य देखभाल खर्च में वृद्धि का कारण बनता है जिसे अन्य चीजों में लगाया जा सकता है.'
ये नये आंकडे विश्व स्वास्थ्य संगठन के उन आंकडों के बाद आए हैं जिनमें कहा गया है कि विश्व के सर्वाधिक 20 प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं. इनमें दिल्ली को सर्वाधिक प्रदूषित शहर बताया गया है. विश्व में श्वसन संबंधी बीमारियों से सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं. हार्वर्ड केनेडी स्कूल में एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन की निदेशक रोहिणी पांडे ने कहा, 'वायु प्रदूषण के चलते दो अरब से अधिक जीवन वर्षों का नुकसान एक बहुत बडी कीमत है.'

Friday, February 20, 2015

अगर  लोगों के चंदे से एक पार्टी खड़ी की जा सकती है तो लोगों के चंदे से क्या एक न्यूज़ चैनल भी खड़ा किया जा सकता ? क्या जनता का भी कोई अपना न्यूज़ चैनल हो सकता है ? क्या लोगों का एक ऐसा न्यूज़ चैनल होना चाहिए जो देश में कुछ निजी परिवारों के कब्ज़े से मीडिया को मुक्त करा सके . अगर मुक्त न करा सके तो कम से कम मीडिया मुग़लों को चुनौती दे सके. जनता के चंदे से चलने वाला ये न्यूज़ चैनल ना सरकार के आगे झुके और न ही किसी बड़े कारपोरेट का गुलाम हो. ये एक ऐसा चैनल हो जो जनता के हित में भ्रष्टाचार के खिलाफ देश व्यापी मुहीम छेड़े और घपलों के मामलों को किसी सरकार या धनपशु के कहने पर न दबाए....ये देश का पहला ऐसा न्यूज़ चैनल हो जिसमे एक बृहद सलाहकार मंडल हो और जहां जनता की वेब वोटिंग पर खास ख़बरों को दिखाया जाये. ये न्यूज़ चैनल जनता को पारदर्शिता के साथ बताए कि कोई खबर चैनल पर क्यूँ कम दिखाई गयी और कोई ज्यादा क्यूँ दिखाई जा रही है. इस न्यूज़ चैनल का ऑडिट भी एक जनता द्वारा गठित बोर्ड के ज़रिये हो और सारी जानकारी वेबसाइट पर डाली जाये. क्या ऐसा न्यूज़ चैनल देश में आना चाहिए ? या मीडिया को कुछ निजी परिवारों के हित के लिए छोड़ दिया जाये.i जिसे अपनी सत्यनिष्ठा का सर्वनाश कराना हो वो देश की मुख्यधारा की पत्रकारिता में आ सकता है. और जिसे अपना स्वाभिमान गवाने की इच्छा हो वो मुख्यधारा की राजनीति में जा सकता है. तो क्या पत्रकारिता छोड़ देनी चाहिए ? तो क्या राजनीति का बहिष्कार करना चाहिए? सकारात्मक जवाब है कि दोनों विधाएं जरूरी हैं पर दोनों के मूल्यांकन से पहले देश की नब्ज़ तो जान लीजिये. देश में बढ़ते सामाजिक असंतुलन और बेरोज़गारी के बीच युवाओं की बढ़ती कुंठा का एक परिणाम ये है कि ज्यादातर लोग व्यवस्था पर भरोसा खोते जा रहे हैं. उनकी पहली निराशा सरकार की नॉन-डिलीवरी से है और दूसरी निराशा मीडिया की गिरती साख और सरोकार से है.i देश की सरकार भी क्या करे ? सप्लाई और डिमांड में इतना अंतर है कि जनता को मूल सुविधाएं देना भी नामुमकिन सा हो गया है. यही हाल मुख्यधारा की मीडिया का है.सम्पादक पर टीआरपी और विज्ञापन का इतना दबाव है कि वो चाहकर भी जनता के संघर्ष से नही जुड़ पाता है. हाशिये पर खड़े आम आदमी के पास सिर्फ लाचारी बची है. इसलिए वो मान बैठा है कि देश का नेता भ्रष्ट और मीडिया दलाल है.पुलिस और नौकरशाही से उसका भरोसा कई साल पहले उठ चुका है. महेंगी कीमत पर इन्साफ देने वाले हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ना आम आदमी के लिए थे और ना हैं. सच हे कि हाशिये पर लाचार खड़ा आदमी व्यवस्था को लेकर मोहभंग की स्थिति में है.हमारे जैसे मध्यम वर्ग के लोगों के लिए हाथ में तिरंगा लेकर दौड़ना स्वाभिमान हो सकता है.हमारे लिए देश का संविधान गर्व का विषय हो सकता है. हमारे लिए चुनाव के नतीजे महत्वपूर्ण हो सकते हैं. लेकिन जिन रास्तों पर अभी कंक्रीट नही ढला है जिन छतों को अभी लिंटर नही मिला है जो पैर चमड़े के जूते से दूर है जिन हाथों ने कभी घडी नही पहनी और जो कमज़ोर आँखें चश्मों के लिए मोहताज़ है उनके लिए मोदी, केजरीवाल, नितीश या फिर अर्नब, राजदीप, पुण्य प्रसून, रविश या रजत शर्मा का क्या मतलब है ? ये नाम हमारे लिए बड़े हैं देश की आधी से ज्यादा जनता के लिए इनके कोई मायने नहीं है. मित्रों मै निराशावादी नही हूँ लेकिन सच से भी मुह कैसे फेर लूं? मैं आप पर कोई दबाव नही डाल रहा हूँ लेकिन अगर सच को सर्वोपरी मानते है तो स्वीकार कीजिये कि आजादी अब तक एक तिहाई घरों तक पहुंची है. बाकी सिर्फ जी रहे हैं.
आओ मेरा साथ दो दोस्तों और हिदुस्तान के मीडिया को एक नए आयाम तक पहुचाने की एक पहल करे
संपर्क - डॉ राकेश पुंज
sms करे 09914411433
punjmedia@gmail.com 

दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा को कांग्रेस बने बगैर ईमानदारी से आत्ममंथन करना होगा

क्या डेल्ही के चुनाव परिणाम भाजपा के विजय रथ को रोकने का संकेत दे रहे है ? लगभग अपराजेय रहे नरेन्द्र मोदी दिल्ली विधानसभा का चुनाव हार गए हैं। ये शायद उनके जीवन की पहली चुनावी हार है। हमने कुछ सवालों को नतीजे आने से पहले दिल्ली की सड़कों पर दौड़ते हुए पाया था। बाकी के सवाल तो एक पड़ाव पा गए हैं और उनके आगे और भी नए सवाल खड़े हो गए हैं। पर एक जवाब तय है, इसे मोदी जी की हार के रूप में ही देखा जाएगा। ये सारे तर्क कि उनके लिए तो जनादेश मई 2014 में ही आ चुका है और वो तो प्रधानमंत्री हैं और विधानसभा अलग मामला है या ये तो महज किरण बेदी की हार है, बेमानी हैं। नरेंद्र मोदी ने ख़ुद अपने आप को इस मुकाबले के लिए प्रस्तुत किया। अमित शाह और तमाम दिग्गजों की मौजूदगी के बाद भी वो इस मुकाबले में छाए रहे। किरण बेदी को रणनीतिक तौर पर उतारे जाने का फैसला भी उनकी मंजूरी या सोच के बिना तो नहीं ही हुआ था। ख़ुद और उनकी टीम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके लगातार विस्तार पाते आभामंडल से सीधा मुकाबला करने से डर रहे थे। वो चाह ही रहे थे कि ये मोदी बनाम केजरीवाल ना हो। दिल्ली के लोग दिसंबर 2013 से ही कह रहे हैं कि पीएम मोदी और सीएम केजरीवाल। पर फिर भी नरेंद्र मोदी ख़ुद सीधे मुकाबले में उतरे और केजरीवाल जीते। ख़ुद मोदी जी अगर इसे स्वीकार करते हैं तो वो अधिक विनम्र और बड़े नेता बनकर उभरेंगे। नहीं तो कांग्रेस की ही परंपरा का पालन होगा जहाँ प्रचार की पूरी कमान संभालने के बाद भी राहुल गाँधी कभी हार के लिए ज़िम्मेदार नहीं होते। केजरीवाल कहकर उनकी आँख से काजल चुराकर ले गए हैं।बहरहाल बहुचर्चित दिल्ली विधानसभा चुनावों में महज दो साल पुरानी आम आदमी पार्टी ने केंद्र और 10 से अधिक राज्यों में शासन करने वाली भारतीय जनता पार्टी को पटखनी दे दी है। दिल्ली ने अब दिसंबर 2013 में ‘आप’ को पूर्ण बहुमत ना दे पाने की भूल सुधार ली है। अब बारी अरविन्द केजरीवाल की है। उन्हें 49 दिनों में की गई अपनी ग़लतियों को भी सुधारना होगा। वो दिल्ली से भाग खड़े होने और पूरे देश में छा जाने की अपनी उच्च महत्वाकांक्षा में खो जाने की सबसे बड़ी ग़लती के लिए माफी माँग चुके हैं। दिल्ली की जनता को उन्हें माफ करने के लिए पर्याप्त समय भी मिला। भाजपा ने अपनी ग़लतियों से जनता को आम आदमी पार्टी की तरफ धकेल दिया। अरविन्द केजरीवाल ने इन तमाम कारणों के साथ आख़िर राख़ में दबी चिंगारी को फिर हवा दे दी है। अब इसे बदलाव के शोलों में तब्दील करना पूरी तरह से उनके ही हाथ में है। विपक्ष के लिए मुफीद नज़र आने वाले केजरीवाल सत्ता भी ठीक से चला सकते हैं ये उन्हें ही साबित करना है। आम आदमी पार्टी पर लगे 'आम राजनीति' के दाग भी उन्हें ही धोने हैं। इस जीत ने आम आदमी पार्टी को तो जिताया है, लोकतंत्र को भी जिताया है और उसे परिपक्व भी किया है। देश का वोटर स्थानीय और राष्ट्रीय चुनावों में कितना साफगोई से फर्क कर पाता है ये उसने बता दिया है। ये भी कि जनता माफ करना भी जानती है। जैसे लोकसभा चुनावों में तमाम आरोपों और गुजरात दंगों के दाग हवा में उछाले के जाने के बाद भी मोदी जी को पूर्ण बहुमत दिया। दिल्ली में तो 7-0 कर दिया। ऐसे ही जनता ने अरविन्द केजरीवाल को भी माफ कर दिया। मोदी-शाह के विजय रथ के सामने घुटने टेके खड़ी कांग्रेस को केजरीवाल और उनके साथियों से सबक लेना चाहिए और इस लोकतंत्र की ताकत में अधिक भरोसा करना चाहिए। आम आदमी पार्टी ने ज़मीनी कार्य से इस ताकत का फायदा उठाया। उन्हें ऐसी सफलता मिलेगी ये ख़ुद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। अब जहाँ इस करारी हार के बाद भाजपा को कांग्रेस बने बगैर ईमानदारी से आत्ममंथन करना होगा, सत्ता के दंभ से बचना होगा, वहीं आम आदमी पार्टी को भी सत्ता के नशे से बचने के डोज़ अभी से लेना शुरू कर देना चाहिए।  अब देखना ये है कि दिल्ली के अच्छे दिन आते हैं या नहीं i क्या डेल्ही के चुनाव परिणाम भाजपा के विजय रथ को रोकने का संकेत दे रहे है ? 

Thursday, February 19, 2015

शादी के नाम पर विधवा से 43 लाख ठगे

मुंबई। शादी के नाम पर मुंबई की 42 वर्षीय विधवा से 43.42 लाख रुपये ठगी का मामला सामने आया है। ठगी करने वाले से महिला की मुलाकात एक वैवाहिक वेबसाइट के जरिए पिछले साल हुई थी।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक पेशे से नर्स महिला के पहले पति की मौत 1996 में हो गई थी। 21 वर्षीय बेटी की जिद के चलते पिछले साल एक वैवाहिक वेबसाइट पर उसने अपना प्रोफाइल पोस्ट किया था।
जहां उसकी बातचीत हेनरी यंग स्मिथ नामक व्यक्ति से होनी शुरू हो गई। लंबे समय तक बातचीत के बाद दोनों भावनात्मक रूप से जुड़ गए थे। स्मिथ ने महिला से ब्रिटिश नागरिक होने और अभी अमेरिका में रहने की बात बताई थी।
पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार स्मिथ ने महिला से अपनी मां की बीमारी के नाम पर पैसे की मांग की। इसके बाद महिला ने करीब 16 बार में 43 लाख 42 हजार रुपये स्मिथ के अकाउंट में डाले।
स्मिथ ने जल्द ही इन पैसों को वापस करने की बात कही थी, लेकिन लंबा समय बीत जाने के बाद में उसने पैसे वापस नहीं किए। जिसके बाद महिला ने पुलिस ने शिकायत दर्ज कराई।

महाशिवरात्रि व्रत की कथा

महाशिवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है।
कहते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया है। कहते हैं इस दिन भगवान शंकर का विवाह भी हुआ था।
व्रत की कथा
एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकार को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।
शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की।
शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था।
शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।
पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची।
शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।
कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया।
तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका।
वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।
शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़फ रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी।
इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।
शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो।
मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।
थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई।
उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

दिल्ली सरकार खुद बनाएगी बिजली, कोल ब्लॉक करेगी हास‍िल!

राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। दिल्ली के लोगों को सस्ती बिजली मिल सके इसके लिए आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने बिजली उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। सरकार की योजना अगले 4-5 सालों में बिजली उत्पादन की क्षमता 4000 मेगावाट तक बढ़ाने की है। इसके लिए राज्य सरकार कोल ब्लॉक हासिल करने की कोशिश करेगी।
कोल ब्लॉक मिलने पर निजी कंपनी के सहयोग से वहां मेगा थर्मल पॉवर प्लांट लगाया जाएगा जिससे कि दिल्ली के लोगों को सस्ती बिजली मिल सके। आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनाव में दिल्ली के लोगों से बिजली की दरें आधी करने का वादा किया था। अब पार्टी सता में आ गई है और इस पर सस्ती बिजली का वादा पूरा करने का दबाव है, लेकिन फिलहाल बिजली वितरण कंपनियों को सब्सिडी देकर ही बिजली की दरें कम की जा सकती है।
वहीं, आप के इस वादे पर तंज कसते हुए पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जो बिजली बना नहीं सकते, वे मुफ्त बिजली के वादे कर रहे हैं। इस पर आप नेता कुमार विश्वास ने कहा था कि बिजली देश की होती है राज्य की नहीं। लेकिन अब आप सरकार ने दिल्ली की बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर गंभीरता से विचार शुरू कर दिया है और केंद्र सरकार से दिल्ली सरकार को कोल ब्लॉक आवंटित करने को कहा है।
दिल्ली के ऊर्जा मंत्री सत्येंद्र जैन का कहना है कि राज्य सरकार के पास बिजली क्षेत्र में बदलाव की बड़ी योजना है जिसके तहत परंपरागत और वैकल्पिक ऊर्जा दोनों स्त्रोतों से बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ाई जाएगी। सरकार की योजना दिल्ली में बिजली उत्पादन की क्षमता 1000 मेगावाट से बढ़ाकर 4000 मेगावाट तक करने की है।

Good Luck के लिए यहां लोग बनाते हैं अंजान से सेक्स संबंध

जावा। दुनिया में ऐसे तो कई अजीबोगरीब परंपराएं हैं, जिनके बारे में सुनकर हम आश्चर्य में पड़ जाएंगे। कुछ ऐसी परंपराएं होतीं हैं जिन्हें आप कभी भी नहीं भुला पाते हैं। इन्हीं में से एक इंडोनेशिया की अजीबोगरीब व चौंकानेवाली गुप्त परंपरा, जिसमें लोग अपने अच्छे भाग्य के लिए अजनबियों के साथ सेक्स करते हैं। डेटलाइन के पत्रकार पैट्रिक अबाउड ने अपनी एक स्टोरी में इस अजीबोगरीब परंपरा के बारे में खुलासा किया है।
डेली मेल में छपी खबर के अनुसार, इंडोनेशिया के मध्य जावा में लोग एक ऐसी गुप्त परंपरा का पालन करते हैं जिसमें वह अजनबियों के साथ सेक्स करते हैं। ऐसा करने के पीछे उनका मानना है कि इससे उनका भाग्योदय होगा और उन्हें मनचाहा हासिल हो पाएगा।
पैट्रिक ने अपनी स्टोरी में बताया है कि जावा में 'सेक्स माउंटेन' नाम की एक जगह है जहां लोग अंजान लोगों से सेक्स करने के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं। इस पहाड़ी का असली नाम गुनुंग केमुकुस है। यह एक यौन परंपरा है जिसका पालन करने वाले लोगों की मान्यता है कि इससे उनके जीवन में खुशहाली और समृद्धि आती है। अंजान लोगों से शारीरिक संबंध बनाने वाले लोग यहां ग्राहक नहीं बल्कि भक्त के तौर पर देखें जाते हैं।
पैट्रिक के अनुसार इस परंपरा का पालन करने वाले लोगों में पति, पत्नियां, विधवाएं, सरकारी अधिकारी, नेता और वेश्याएं भी शामिल होती हैं। इस परंपरा का पालन लगभग 16वीं शताब्दी से किया जा रहा है।
इस सेक्स परंपरा के पीछे एक कहानी है। कहा जाता है कि इंडोनेशिया के एक राजकुमार का अपनी से सौतेली मां से प्रेम संबंध था। कुछ वक्त साथ बिताने के लिए वो इस पहाड़ी पर पहुंचे। उनको जब शारीरिक संबंध बनाते पकड़ लिया गया तो उन्हें वहीं मौत के घाट उतार डाला गया। चूंकि उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई थी और वो दोनों साथ भी नहीं रह सके थे। इसलिए मान्यता का पालन करते हुए अंजान लोग के बीच सेक्स की परंपरा का पालन शुरू हो गया और इसे समृद्धि से जोड़कर देखा जाने लगा।
पैट्रिक ने बताया कि मान्यता के अनुसार यहां आने वाले व्यक्ति को हर 35 दिन के बाद फिर आना होता है। उसे यह काम लगातार 7 बार करना ही होता है, जिसके बाद यह रिवाज पूरा होता है। यहां आने वाले यात्री श्राइन में अपनी श्रद्धा भी व्‍यक्‍त करते हैं। यहां प्रार्थना करने से पहले झरने में स्‍नान भी करते हैं जिसके तुरंत बाद पार्टनर की तलाश करते हैं।
ऐसा करने वाले बहुत लोग हैं, इसलिए यहां यौन-संक्रमित बीमारियों के भी कई मामले सामने आते हैं। पुरुष कंडोम का इस्तेमाल नहीं करते और हेल्थ क्लिनिक होने के बावजूद भी वहां इलाज कराने कभी नहीं आते। क्षेत्र के डाक्‍टरों के अनुसार, यहां कई तरह की बीमारी फैलने का खतरा बना हुआ है, लेकिन लोग यहां अच्‍छी किस्‍मत की धारणा लिए पहुंचते हैं

Sunday, January 25, 2015

गणतन्त्र में हमारा आराध्य हो सामान्य व्यक्ति


अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का गणतन्त्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आना कई कारणों से महत्वपूर्ण है। ओबामा का भारत यात्रा को लेकर प्रकट हो रहा उत्साह भारत का विश्व बिरादरी में बढ़ते रुतवे का परिचायक है। 26 जनवरी को लाल किले में लाखों लोग तथा देशभर में टी.वी. के सामने बैठे करोड़ों लोगो को भारतीय सैन्य शक्ति की हुंकार रोमांचित कर देती है। भंयकर सर्दी में भी भारतीय रणवांकुरों तथा वहां उपस्थित लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। आत्म्विश्वास एव पौरष से भरे हमारे सैनिकों के सधे हुए कदम मानों विश्व को सन्देश देते हैं कि बेशक हम शांति के उपासक हैं लेकिन युद्ध में भी हमारा कोई मुकाबला नहीं है-
जब रण करने को निकलेंगे भारत माँ के दीवाने
धरा घंसेगी तूफान मचेगा , व्योम लगेगा थर्राने-
कवि की ये पंक्तियां यथार्थ लगती हैं। अपनी इस गणतन्त्रीय यात्रा में भारत ने सफलता के अनेक कीर्तिमान अपने नाम दर्ज किए हैं। अपने गणतन्त्र की 65वीं वर्षगांठ हमें ईमानदारी से अपना आत्मावलोकन करने का आहवान करती है। जहां हमें अपनी उपलब्धियों के लिए स्वयं की सराहना करनी चाहिए वहीं हमें अपनी असफलताओं से सीख भी लेनी चाहिए। जहाँ मात्र उपलब्धियों की चकाचैंध मे खो जाना सच्चाई से दूर जाना होगा वहीं मात्र असफलताओं को रोना रोना भारत के लाखों कर्म वीरों जिनके बल पर हमने उपलब्धियों को हासिल किया उनके साथ अन्याय होगा।
      भारत की इस छ: दशक की यात्रा की ओर देखने से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि हममें क्षमता, प्रतिभा व योग्यता कूट कूट कर भरी है। हम चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं । हमारे लिए असंभव कुछ भी नही। अपनी गणतंत्रीय अवधि में  प्राप्त उपलब्धियों का मूल्यांकन करने से पहले एक बार हमें अपने देश के ऐतिहासिक घटनाक्रम पर दृष्टिपात करना आवशयक है। अंग्रेजों की कूटनीति से पराजित भारतीय नेतृत्व ने देश का विभाजन स्वीकार कर विश्व की सबसे बड़ी त्रासदी को जाने-अनजाने आमंत्रित किया । जान माल की भंयकर हानि, टूटे दिल, थका -हारा आम देशवासी आजादी का जश्न भी पूरे मन से मना नहीं सका। हजारों वर्षों की गुलामी के बाद मिली आजादी (स्वतन्त्रता नहीं) सामाजिक , राजनैतिक व प्रशासनिक ब्यवस्था कानून सब कुछ विदेशी पद्धति पर, मैकालेे की शिक्षा पद्धति (स्वत्व, स्वाभिमान दूर दूर तक नही) इस सबके साथ-2 पहले कश्मीर में 1948 में पाक के साथ युद्ध फिर 62, 65 और 1971 और कारगिल युद्ध..... इतना सब होने पर भी भारत ने हार कहाँ मानी ? आज सैन्य शक्ति में भारत विश्व के अग्रणी स्थान पर खड़ा है। भारतीय सैनिकों के साहस, शौर्य व पराक्रम का नवीनतम जलवा दुनिया ने कारगिल में देखा अैार दांतो तले अंगुली दबाकर रह गई। भारत को सांप व सपेरों का देश कहने वाले आज भारतीय विज्ञान की उपलब्धियों पर आश्चर्यचकित हैं।  7, 7 उपग्रह एक साथ आकाश में छोड़ना, अग्नि, पृथ्वी, नाग जैसी मिसाइलें व अमेरीका की सारी आकाशीय निगरानी को छकाते हुए परमाणु विस्फोट कर देना भारतीय विज्ञान की सफलता की यात्रा में मील के पत्थर है। चन्द्रयान के बाद मंगलयान ने तो भारत को विज्ञान जगत में अत्यंत सम्मानीय स्थान प्राप्त करा दिया। भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा का लोहा सम्पूर्ण विश्व मानने को बिवश है।  यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि यह सब विश्व में शायद सबसे कम सुरक्षा बजट में हमने संभव कर दिखाया है। इस सबके साथ भारतीय अर्थ व्यवस्था ने भी विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। हमें अर्थशास्त्र सिखाने वाले, बिन मांगे उपदेश देने वाले अमेरीकी व ब्रिटिश अर्थशास्त्री जहाँ औंधे मुंह पड़ी अपनी अर्थ व्यवस्था को लेकर आंसू बहा रहे हैं वहीं भयंकर आर्थिक मंदी में भी भारत अपनी विकास दर टिकाए ही नहीं बल्कि बढ़ाने में भी सफल होता दिख रहा है। इतना ही नहीं भारतीय मेघा शक्ति ने विश्व में सब जगह अपना सम्मानजनक स्थान बनाया है। इसी झलक कुछ आंकड़ो से समझी जा सकती है। अमेरीका में 12 प्रतिशत वैज्ञानिक, 38 प्रतिशत  डाक्टर । नासा में 36 प्रतिशत वैज्ञानिक, अमेरीका में 34 प्रतिशत माइक्रोसाफट इंजीनियर, 28 प्रतिशत आई.बी.एम. मे कर्मचारी भारतीय है। इंटेलपैन्टियम 90 प्रतिशत कम्यूटर बनाती है। इसकी स्थापना विनोद धाम ने की। सवीर भाटिया ने हॉट मेल, विनोद खोसला ने सन माइक्रो सिस्टम की शुरूआत की। सिलिकान वैली में स्थापित 10 उद्योगों में से 4 भारतीयों द्वारा संचालित हैं। भारत का बालीवुड 800 फिल्में प्रतिवर्ष बनाता है। भारत में इस समय 3 दर्जन से अधिक अरबपति हैं। जहाँ सारी दुनिया बुढिया रही है वहीं भारत आने वाले समय में सबसे अधिक युवकों का देश होने वाला है अर्थात भविष्य हमारा है। इस प्रकार देखेंगे तो
भारत की सफलता की कहानी बहुत लम्बी है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इराक व अफगानिस्तान में चुनाव संपन्न कराने में भारत की सहायता मांगता है। शिक्षा जगत में भारतीय आई.आई.एम. व आई.आई.टी. ने सम्मान का स्थान प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त अक्षर धाम दिल्ली, योगगुरू बाबा राम देव, गायत्री परिवार, माँ अमृतामयी, श्री श्री रविशंकर आदि के आगे संपूर्ण विश्व नतमस्तक होता जा रहा है।
बहुत कुछ करना अभी शेष है-
काश! भारत की यही सम्पूर्ण सच्चाई भी होती। लेकिन ऐसा नहीं है। जहाँ भारत की उपरोक्त उपलब्धियां प्रत्येक भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर देती है। वहीं एक दूसरा भारत भी यहाँ बसता है। जो कहता सुना जा सकता है
     उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का ये,
     उजाला करोड़ो घरों तक न पहुँचा।
यह विडम्बना ही है कि 3 दर्जन से अधिक अरब पतियों के देश भारत में आज 30 करोड़ भारतीय सर्विया, लिथुनिया और मंगोलिया के गरीबों की तुलना में अधिक दुर्दशा के शिकार हैं। विकसित देशों के दबाव में गरीबी में 9.06 प्रतिशत की कमी दिखाई गई है। हमारी समृद्धि 300 स्मृद्ध औद्योगिक घरानों तक सिमटी है । 10 करोड़ से अधिक वनवासी, महानगरो में झुगी -झोपडियों में रहने वाले करोड़ों लोग आज भी जीवन की मूलभूत सुखसुविधाओं से वंचित हैं। ‘कोड़ में खाज‘ की तरह भयंकर गरीबी से जूझते समाज में अंधविश्वास व कुरीतियाँ अभी भी फलफूल रही हंै। चंद्रमा पर जल खोज लाने वाले हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा जैसी कैंसर नुमा बिमारियाँ समाज को खोखला कर रही हैं। अल्पसंख्यकवाद के नाम पर गोपाल के देश में देशी गाय का जी भर कर कत्लेआम हुआ। हमारी देशी गाय की 32 नसलें लुप्त हो चुकी हैं।  पाकिस्तान के बाद अब चीन बार-बार भारतीय सीमा पर घुसपैठ कर भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।  नेताओं , अधिकारियों व उधोगपतियों का 1लाख 70 हजार करोड रु स्विस बैंकों में जमा है । हम भारत की गुलामी व अवनति के लिए राजाओं को दोषी ठहराते हैं लेकिन विचार करें कि पहले देश में कुल 565 राजा थे। हालांकि अधिकांश राजा सही माने में लोकसेवक थे तो भी माना जाता है कि अधिकांश राजा लोग लोगों के खून-पसीने पर ऐश्वर्य युक्त जीवन जीते थे। लेकिन आज लोकसभा, राज्यसभा के सांसद मुख्यमंत्री, राज्यपाल, विधायक एवम् विदेशो में राजदूत ये सब किसी राजा से कतई कम नहीं हैं।  इन की संख्या हजारों में तो है ही। यद्यपि केंद्र में आई नई सरकार आने के बाद हर जगह सकारात्मक परिवर्तन दिखने शुरू हुए हैं।
जहाँ भारत की उपलब्धियो की कहानी लम्बी है वहीं असफलताओं की दास्तां भी छोटी नहीं है। विश्व में अपनी सफलता के झण्ड़े गाढ़ने वाले भारतीय भारत की सोचें, विदेशो में जमा पैसा भारत में आ जाए और राजनेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों के मन में भारत को महाशक्ति बनाने का संकल्प जाग जाए तो हमारे लिए कुछ भी कठिन नही है। बहुत समय बाद दिल्ली में योग्य नेतृत्व जिसके दिल में करोड़ों गरीब देशवासियों के लिए दर्द और आँखों सुखी सम्पन्न देश बनाने का स्वप्न देखा जा रहा है। राजनेताओं के साथ साथ प्रशासनिक स्तर सब जगह मेहनत की पराकाष्ठा हो रही है। बस केवल एक बात ध्यान में रखनी होगी कि केवल राजनीती के बल पर स्थायी परिवर्तन नहीं आता। समाजिक परिवर्तन जनता के सक्रिय सहयोग के बिना सम्भव नहीं होता। इसलिए देश को तन और मन से नए नेतृत्व के साथ खड़े होकर विश्व गुरु भारत के स्वप्न को साकार करने में जुट जाना होगा। हमारी लोकतन्त्र की पद्धति अनेक कमियों के बाद भी सर्वश्रेष्ठ है। लोकतन्त्र में लोक महत्वपूर्ण तत्व है। सर्व सामान्य व्यक्ति जितना राष्ट्र के प्रति जागरूक होगा लोकतन्त्र हमारा इतना सफल होगा। हमारे गणतन्त्र के 64 वर्ष की कहानी इस बात का पुख्ता सबूत हैं
कौन कहता है आसमां में छेद नहीं हो सकता।
बस एक पत्थर तबीयत से उछालो तो यारो।।

Sunday, July 6, 2014

पंजाब एवं हरियाणा चंडीगढ के उच्च न्यायालय के केन्द्रीय भर्ती एजेंसी क्लर्क के पद पर भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे है। इच्छुक व योग्य उम्मीदवार आवेदन कर सकते है।
पद का नाम : क्लर्क, जूनियर स्केल आशुलिपिक, स्टेनो टाइपिस्ट, चालक।
पदों की संख्या : कुल 119 पद।
वेतनमान : क्रम संख्या 2, 4 का वेतन-पीबी, रूपए, 5200-20200/- + ग्रेड रूपए, 2400/- सहित। क्रम संख्या 1, 3 का वेतन पीबी, रूपए, 5200-20200/- + ग्रेड पे. रूपए, 1900/- सहित।
शैक्षिक योग्यता... क्लर्क: बैचलर डिग्री या 10 वीं कक्षा में विषय के रूप में कंप्यूटर अनुप्रयोग और हिंदी या संस्कृत में डिग्री/डिप्लोमा होना चाहिए।
जूनियर स्केल स्टेनोग्राफर... बैचलर डिग्री या स्टेनो टाइपिस्ट के रूप में कंप्यूटर अनुप्रयोग और 1 वर्ष के अनुभव में समकक्ष योग्यता और डिग्री/डिप्लोमा होना आवश्यक है। स्टेनो टाइपिस्ट... बैचलर डिग्री या कंप्यूटर अनुप्रयोग में समकक्ष योग्यता और डिग्री/डिप्लोमा होना चाहिए।
चालक... हल्के मोटर वाहन और मध्यम यात्री मोटर वाहन और हल्के मोटर वाहन/मध्यम यात्री मोटर वाहन के लिए ड्राइविंग के 2 साल के अनुभव के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस के साथ पारित कर 10 वीं होना चाहिए।
आयु सीमा... उम्मीदवार की आयु 26 जून 2014 की स्थिति के अनुसार सभी पदों के लिए 18 से 40 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आरक्षण वाले उम्मीदवारों को आयुसीमा में छुट देय हैं। अधिक जानकारी के लिए निचे दी गई वेबसाइट को देखे।www.recruitmenthighcourtchd.com

साईं बाबा पर विवाद पैंदा करना भी हिन्दू वोट बैंक को बाटने का इक छाड्यांतर हैं !

श्री  शंकराचार्य जी के साईं बाबा जी पर दिए गए विवादित ब्यान पऱ  होहल्ला जितना ज्यादा होगा  उतना है बीजेपी क़ो नूकसान ज्यादा होगा !
आज तक कांग्रेस हिन्दू वोट बैंक को काट कर सत्ता का सुख लेती  रही है ! अबकी बार पहली  बार  बीजेपी ने कांग्रेस का फार्मूला अडॉप्ट कर कांग्रेस वोट बैंक   को आम आदमी पार्टी  की मदद से विभाजीत किया है !
जयादातर उच्च अहुदो पर बिराजमान हिन्दु संत कही ना  कहीं  कांग्रेस के हिमायती ही रहे है !
साईं बाबा पर विवाद पैंदा करना भी हिन्दू वोट बैंक को बाटने का इक छाड्यांतर हैं !साईं  चाहे किसी भी मजहब के हों सवाल ये  होता हैं की आज जरुरत कया पडी थी ऐसा ववाद खारह करणे क़ी ,सिर्फ वोट बैंक के कारन ? ,क्यों  के साईं भगतो का इक बडा वोट बैंक है !अगर वो अलग हो गया तो बीजेपी का काफी नुक्सान हों  सकता है !
किसी को भी किसी की आस्था के साथ खिलवाड़ करने की हमारा सविंधान इजाजत नहीं   देता है  !  वोट  बैंक की खातिर आज साईं को  विवादित बना दिया, कल किसी और को विवादित कर दोगे ! मौजूदा समय में कितने लोग है जो खुद को अवतार या भगवन कहलाते है ! उनको कभी रोका है किसी ने !

साईं  चाहे किसी भी मजहब के हों उनको मानने वाले हिंदू धर्म के अनुयायी  है !  साईं भक्तो ने साईं के  मंदिर बनये हैं ना की मसजिद !  किसी भी साईं मंदिर में नमाज़  अदा नही की  जातीं !साईं को मानने वाले हिन्दू हैं !हिन्दू विदी द्वारा पुजा  क़ी  जाती  हैं ! ये सारा ड्रामा हिन्दू वोट बंक को बॉटने की सजिश हैं !इसलिए मेरी सभी देश वासिओ , साईं भक्तो ,हिदुओ से विनती  है के पोलिटिकल संतौ को पहचानो और किसी  राजनैतिक  छाड्यांतर में  ना आ कर हिन्दू  की गरीमा को पहचानो !आज जरुरत है हिन्दू वोट बैंक को इकठा रखने की !

Wednesday, July 2, 2014

झूठे केस में पुरुषों को फंसा रही हैं महिलाएं, अदालतें भी चिंतित

झूठे केस में पुरुषों को फंसा रही हैं महिलाएं, अदालतें भी चिंतित

 
झूठे केस में पुरुषों को फंसा रही हैं महिलाएं, अदालतें भी चिंतित
नई दिल्ली     सबसे घिनौना अपराध होता है दुष्कर्म का और उतना ही घिनौना होता है इस तरह के अपराध का आरोप। इस तरह के अपराध का आरोप लगने पर व्यक्ति की सारी मान प्रतिष्ठा तो नष्ट होती ही है, साथ में उसकी जिंदगी नारकीय भी हो जाती है। करावल नगर का इब्राहिम खान पर दुष्कर्म का आरोप लगा था और यह आरोप भी और किसी ने नहीं, बल्कि उसकी सगी बेटी ने उस पर लगाया था। संगीन आरोप थे कि इब्राहिम ने बेटी से दुष्कर्म किया, जिससे वह गर्भवती हो गई। इस आरोप के कारण इब्राहिम का सामाजिक बहिष्कार हुआ। वह जेल गया। वहां पर भी कैदियों ने उसे पीटा। सात साल जेल में रहने के बाद साबित हुआ कि उसकी बेटी ने उस पर झूठा मुकदमा महज इसलिए दर्ज कराया था कि वह उसके द्वारा किए जा रहे देह व्यापार में बाधक था। बेटी को जो बच्चा पैदा हुआ था, वह भी उसका नहीं था। अदालत ने इब्राहिम को बेगुनाह साबित कर छोड़ तो दिया, मगर तब तक उसकी पूरी दुनिया तबाह हो चुकी थी। इस तरह के मामलों में इब्राहिम अकेला नहीं, बल्कि राजधानी में दर्जनों इब्राहिम ऐसे हैं, जो दुष्कर्म व छेड़छाड़ के झूठे मुकदमों का खामियाजा भुगत चुके हैं।
पिछले एक साल में राजधानी में झूठे मुकदमों का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। इस संबंध में दिल्ली की कई जिला अदालतें व दिल्ली हाईकोर्ट भी अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं। राजधानी की जिला अदालतों में लंबित दुष्कर्म व छेड़छाड़ के मामलों पर नजर डाली जाए तो पता लगता है कि पिछले कुछ समय में महिलाओं द्वारा कानून को अपने लाभ के लिए इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। मसलन अगर प्रेमी शादी से इन्कार कर दे तो उस पर दुष्कर्म का मुकदमा और पड़ोसी से झगड़ा हो तो उस पर छेड़छाड़ का आरोप। जब विवाद शांत हो जाता है तो महिलाएं अदालतों में अपने बयानों से ही पलट जाती हैं। झूठे आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने वाले लोगों पर कार्रवाई के लिए कानून भी है, मगर पिछले एक साल के दौरान ऐसी किसी भी महिला या युवती के खिलाफ अदालत या पुलिस की ओर से कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है, जिसने झूठा मुकदमा दर्ज कराने का अपराध किया हो।
दिल्ली हाईकोर्ट में पिछले छह माह के दौरान दुष्कर्म के 13 मामलों में दर्ज एफआइआर रद करने के लिए याचिका दायर की गई। जिनमें बताया गया कि शिकायतकर्ता ने आरोपी के द्वारा शादी से इन्कार के बाद मुकदमा दर्ज कराया था और अब उनकी शादी हो चुकी है। इसलिए मुकदमा खारिज किया जाए।
झूठा मुकदमा दर्ज कराने के संबंध में यह है कानून
अगर कोई भी महिला या व्यक्ति किसी के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराता है तो उसके खिलाफ पुलिस द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 193 व 197 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाता है। यह मुकदमा पुलिस खुद से या अदालत के आदेश पर भी दर्ज कर सकती है। इस अपराध में सात साल कैद व जुर्माना की सजा का प्रावधान है। -अधिवक्ता मनीष भदौरिया, दिल्ली।
असफल प्रेम में अधिक केस दर्ज
आज के समय में दुष्कर्म के अपराध को लेकर बनाए गए कानून का सबसे अधिक दुरुपयोग युवतियों द्वारा किया जा रहा है। विशेष तौर पर लिव-इन में रहने वाली युवतियों या प्रेम-प्रसंग में असफल होने वाली युवतियों को जब उनका प्रेमी या साथी विवाह से इन्कार कर देता है तो वे अपने प्रेमी के खिलाफ शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का मुकदमा दर्ज करा देती है। दिल्ली में ऐसे मामले बहुतायत मात्रा में दर्ज हो रहे हैं।
-अधिवक्ता राजीव जय, चेयरमैन, कोआर्डिनेशन काउंसिल ऑफ ऑल बार एसोसिएशन।
पुलिस जानबूझ कर नहीं करती मामला दजर्
झूठे मुकदमे दर्ज कराने वाले लोगों पर मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार पुलिस के पास है। मगर, पुलिस जानबूझ कर इस अपराध के संबंध में मुकदमा दर्ज नहीं करती। पुलिसिया कार्रवाई और एक नए मुकदमे की जांच व उसे उसके अंजाम तक पहुंचाने की दौड़-धूप से बचने के लिए पुलिस ऐसे मामलों में आरोपियों को अभयदान दे देती है, जोकि कानूनन गलत है। पिछले एक साल में पुलिस ने एक भी महिला के खिलाफ ऐसा मुकदमा दर्ज नहीं किया है, जिसने दुष्कर्म या छेड़छाड़ का झूठा केस दर्ज कराया हो।
-अधिवक्ता केडी भारद्वाज, पूर्व मुख्य लोक अभियोजक दिल्ली ।

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