Thursday, February 25, 2016

हाफिज सईद कुछ भारतीय पत्रकारों को टेस्ट करने के चक्कर में

अब तक भारत में अपने नापाक मंसूबों से सफल न होने से बौखलाई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। अब उसका पयास है भारत के युवाओंपत्रकारों व कुछ संगठनों तक अपनी पहुंच बनाने का। अब आईएसआई सोशल मीडिया को भी हथियार बना रही है। आईएसआई अंगूठा छाप लश्कर चीफ हाफिज सईद के ट्विटर और फेसबुक एकाउंट चलाकर भारत के खिलाफ जहर उगल रही है। सूत्रों के अनुसार अब तक भारत में अपने नापाक मंसूबों में असफल होने के बाद आईएसआई अपने जेहादी पोपेगेंडा के साथ युवाओं को भड़काने और उन तक पहुंच बनाने के अलावा कुछ संगठनों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए ट्विटरफेसबुक और यू-ट्यूब जैसे एकाउंट का सहारा ले रही है। यह भी खबर है कि हाफिज सईद ने भारतीय इलैक्ट्रॉनिक चैनलों के कुछ पत्रकारों व एंकरों के बारे में भी जानकारी लेना शुरू कर दी है ताकि उन्हें एपोच कर अपने पोपेगेंडा के लिए उन्हें माध्यम बनाया जाए। इन पत्रकारों व एंकरों का बैक ग्राउंड छाना जा रहा है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि जो मोदी सरकार के खिलाफ हैं और अक्सर मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाते रहते हैं। यह देखा जा रहा है कि इनमें से कौन-कौन एपोचेबल हो सकता है। आईएसआई ने आतंकी संगठन लश्कर के चीफ हाफिज सईद के एकाउंट चलाने और उस पर भारत में अस्थिरता पैदा करनेयुवाओं को भड़काने और जेहादी बातों को अपलोड करना शुरू कर दिया है। चूंकि अगूंठा छाप हाफिज सईद को अपनी भाषा के अलावा और कोई भी भाषा बोलनी-लिखनी नहीं आतीलिहाजा आईएसआई ने उसके ट्विटरफेसबुक और यू-ट्यूब जैसे एकाउंट चलाने का जिम्मा ले लिया है। सूत्रों के अनुसार भारत ने अब तक हाफिज के इस तरह के करीब दो दर्जन एकाउंट बंद कराए हैं। इसके बाद आईएसआई ने भी रणनीति बदलते हुए कमान अपने हाथ में ले ली है। सूत्रों के अनुसार कहने को हाफिज सईद का साइबर सेल हैजो भारतीय पत्रकारों का एक डाटा बैंक तैयार कर रहा है। इनमें पत्रकारों के मोबाइल नंबर-मेल और ट्विटर एकाउंट का लेखा-जोखा है। इसके अलावा कुछ छात्र संगठनों व कुछ अन्य संगठनों का भी डाटा बैंक तैयार किया जा रहा हैताकि हाफिज के नाम पर सोची समझी रणनीति के तहत अपनी बातों को इस एकाउंट पर डाला जा सके। अगर सूत्रों की मानें तो कुछ दिन पहले हाफिज सईद ने कुछ भारतीय पत्रकारों से ट्विटर के माध्यम से संपर्क भी साधा था। हाफिज के तथाकथित एकाउंट पर आ रहे संतोषजनक जवाब ने सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया है। सुरक्षा एजेंसी उन भारतीय पत्रकारों से भी संपर्क करने वाली है जो ट्विटर के माध्यम से लश्कर सरगना हाफिज सईद से जुड़े हैं। आईएसआई की इस खतरनाक रणनीति पर अविलंब रोक लगाना जरूरी 

जेएनयू की बिसात पर रोटियां सेंकते सियासी दल

पिछले कई दिनों से जारी जेएनयू विवाद के लिए गुनहगार कौन-कौन हैं यह तो अब अदालतें ही तय करेंगी लेकिन सियासी दल बहरहाल इस मुद्दे को लेकर अपने सियासी फायदे नफे-नुकसान के लिए अपनी रोटियां सेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के पाले खींचकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। दरअसल कटु सत्य तो यह है कि जिस दिन से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने उसी दिन से एक तरफ कांग्रेस पार्टी और मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ हो गया। आप पिछले दो साल देख लें शायद ही कोई ऐसा मुद्दा हो जब कांग्रेस व इस अल्पसंख्यक वर्ग ने मोदी का विरोध नहीं किया हो। जहां तक वामपंथियों का सवाल है लगभग सारी दुनिया में सिमट चुके वामदलों को भी मौके की तलाश थीजब वह अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर सकें। इनकी मदद कर रहे हैं इलैक्ट्रॉनिक चैनल के कुछ एंकर व मैनेजमेंट। टीवी पर रोज यह किसी न किसी बहाने मोदी और उनकी सरकार को घेरने का प्रयास करते हैं। आज इलैक्ट्रॉनिक चैनल भी दो खेमों में बंट गए हैं। कुछ खुलकर विरोध कर रहे हैं तो कुछ खुलकर समर्थन। इस सियासी जंग में असल मुद्दे दब रहे हैं। जेएनयू में नौ फरवरी को क्या हुआनौ फरवरी को जेएनयू में एक सभा में पाकिस्तान जिन्दाबादकश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी तक जैसे नारे लगे। इस सभा में और नारेबाजी में बाहर से आए लोगों के साथ न सिर्प जेएनयू के छात्र-छात्राएं थीं बल्कि उस असैम्बली में कन्हैया कुमार भी मौजूद था। सो सभा तो हुई और उसमें राष्ट्र विरोधी नारे लगे यह तो तय है। अब सवाल उठता है कि कन्हैया ने नारे लगाए या नहींक्या उस पर देशद्रोह का केस होना चाहिए था या नहींदिल्ली पुलिस के कमिश्नर भीम सेन बस्सी ने कई बार दोहराया है कि पुलिस के पास कन्हैया के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं जो अदालत में पेश कर दिए गए हैं। वीडियो रिकार्डिंग सही है या नहीं निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच से ही तय हो पाएगा। इसका पता लगाने के लिए दिल्ली पुलिस भारत विरोधी नारों के टेप और कन्हैया कुमार की आवाज की फोरेंसिक जांच करा रही है। सोशल मीडिया पर वायरल अलग-अलग वीडियो में कन्हैया कुमार के राष्ट्र विरोधी नारे लगाने और नहीं लगाने के दावे किए जा रहे हैं। फोरेंसिक जांच से साफ हो पाएगा कि भारत विरोधी नारों में कन्हैया की आवाज थी या नहींदिल्ली पुलिस का दावा है कि वीडियो टेप के अलावा पुलिस के पास 17 गवाह हैं। उन्होंने पुलिस के सामने कन्हैया के खिलाफ बयान दर्ज कराए हैं। ज्यादातर ने कहा कि कन्हैया देश विरोधी नारे लगा रहा था। वह उस कार्यक्रम का हिस्सा था जिसमें देश विरोधी नारे लगे। कन्हैया ने न तो नारों को रोकने के लिए कहा और न ही सभा से हटा। 17 गवाहों में ज्यादातर जेएनयू के हैं। पर यह सियासी दल कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं करना चाहते और कन्हैया को बेकसूर साबित करने में लगे हुए हैं। हम कहते हैं कि अगर कन्हैया ने देशद्रोह नहीं किया और उन पर जबरन यह चार्ज लगाया गया है तो अदालतें हैं वह उसे राष्ट्रद्रोह से मुक्त कर देंगी। हमारी लड़ाई जेएनयू से नहीं है। जेएनयू ऐसा नहीं कि वह एक महान संस्थान नहीं पर मुट्ठीभर छात्रों की वजह से वह आज निशाने पर आ गया है। अगर आज जेएनयू गलत कारणों से सुर्खियों में है तो इसके लिए सरकारयूनिवर्सिटी प्रशासन और जेएनयू के छात्र सभी जिम्मेदार हैं। राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए जेएनयू में गिरफ्तारी भले ही पहली बार हुई होलेकिन अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में ऐसी हरकतें वहां लगातार होती रही हैं। भारत के टुकड़े करने की नारेबाजी इसकी चरम परिणति थी। यदि पहले ही ऐसी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती तो यह दिन न देखना पड़ता। 80 के दशक में जेएनयू कैम्पस में इंदिरा गांधी के खिलाफ नारेबाजी को सियासी विरोध मानकर भले भुला दिया जाएलेकिन 2000 में कारगिल में लड़ने वाले वीर जवानों के साथ जो हुआउसे कतई भुलाया नहीं जा सकता है। कारगिल युद्ध खत्म होने के बाद ही जेएनयू कैम्पस में भारत-पाकिस्तान मुशायरा का आयोजन किया गया। मुशायरे का आनंद लेने के लिए कारगिल में पाकिस्तान के साथ लड़ने वाले सेना के मेजर केके शर्मा और मेजर एलके शर्मा भी पहुंच गए। एक पाकिस्तानी शायर की भारत विरोधी शायरी का कारगिल के दोनों हीरो ने विरोध किया। इस पर जेएनयू के छात्रों ने उल्टा उन दोनों की बुरी तरह पिटाई कर दी। अधमरी हालत में उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया। उस समय यह मुद्दा संसद में भी उठा और तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस घायल मेजरों को देखने अस्पताल भी गए। लेकिन छात्र संघ और शिक्षकों के विरोध के कारण कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। सरकार ने एक जांच कमेटी भी बनाई पर इसको जेएनयू में घुसने नहीं दिया। 2010 में पूरा देश जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के हाथों 76 जवानों के मारे जाने का शोक मना रहा थातब जेएनयू में इसकी खुशी में पार्टी दी जा रही थी। अखबारों में इसकी खबर छपने के बावजूद तत्कालीन संप्रग सरकार ने कोई कार्रवाई की जरूरत नहीं समझी। इसके बाद जेएनयू के कुछ छात्रों के सीधे नक्सलियों के साथ संबंध भी मिले और गढ़चिरौली में जेएनयू छात्र हेम मिश्रा को गिरफ्तार भी किया गया। पुलिस की जांच से साफ हो गया है कि भारत की बर्बादी के लिए कार्यक्रम आयोजित करने की साजिश रचने वाला उमर खालिद भी हेम मिश्रा की तरह डीएसयू का सदस्य है। आज दुर्भाग्य है कि जेएनयू के कुछ छात्रों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की जगह कुछ सियासी दल अपनी रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं।

शत्रु बोले, भाजपा मेरी पहली और आखिरी पार्टी

हैदराबाद। भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि "भाजपा उनकी पहली और आखिरी पार्टी" है। उन्होंने बिहार के पार्टी नेताओं द्वारा उन्हें पार्टी मामलों की आलोचना करने के कारण पार्टी छोडने की सलाह देने के लिए निशाने पर लिया। 

अभिनेता-नेता ने कहा कि उनके मन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए काफी सम्मान है। उन्होंने कहा कि यह कौन लोग कह रहे हैं, वही लोग जो बिहार (विधानसभा चुनाव) में मिली शर्मनाक हार के लिए जिम्मेदार हैं। जो खुद बाहर जाने की राह पर हैं, जो अपना चेहरा दिखाने के लायक नहीं बचे हैं। वे केवल अपनी हताशा जाहिर कर रहे हैं। सिन्हा ने यहां संवाददाताओं से कहा कि इन नेताओं को पहले अपनी साख पर ध्यान देना चाहिए।  

यूपी: अमित शाह ने प्रदेश कार्यालय का उद्घाटन किया

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) ने पूरी तरह से कार्पोरेट लुक अपना लिया है। भाजपा ने प्रदेश कार्यालय का जीर्णोद्धार कराया, जिसका गुरूवार सुबह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उद्घाटन किया। नए कार्यालय के उद्घाटन के बाद शाह ने कहा, "यहां का कार्यालय आधुनिक तकनीक से बना है। मैंने प्रभारी रहते हुए इस बारे में सोचा था। अब इस कार्यालय में सभी सुविधाएं मौजूद हैं।" पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि इस साल दिसंबर तक देशभर के सभी जिला मुख्यालयों पर पार्टी कार्यालय के लिए जमीन खरीद ली जाएगी। उत्तर प्रदेश में 40 जिलों में जमीन खरीद ली गई है। शाह ने कहा, "केंद्र में भाजपा की सरकार बनने का पूरा श्रेय उत्तर प्रदेश को जाता है सभी कार्यकर्ता मिलकर भाजपा की विचारधारा को आगे बढ़ाएं।" उन्होंने कहा कि हमारे सामने उत्तर प्रदेश में 2017 में सरकार बनाने की चुनौती है। भाजपा के नए कार्यालय में कुशाभाउ ठाकरे सभागार, माधव सभागार के नाम से दो ऑडीटोरियम बनाए गए हैं। कुशभाउ ठाकरे सभागार में 200 लोगों के एक बैठने की व्यवस्था है। चुनाव प्रबंधन रूम, विवेकानंद रूम, महामना लाइब्रेरी, आईटी सेल, सोशल मीडिया सेल, रिसर्च विंग भी अलग से बनाए गए हैं। इसके अलावा मीडिया कांफ्रेंस रूम को भी नया लुक दिया गया है। बाहरी नेताओं के ठहरने के लिए अलग से फाइव स्टार कमरों की व्यवस्था भी की गई है। उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष से लेकर हर पदाधिकारी के लिए अलग-अलग कमरों की व्यवस्था की गई है। 

6 साल के मासूम की किडनैप कर की थी हत्या, जज बोले मरते दम जेल में ही रहना

मोहाली। शहर के चर्चित महरम किडनैपिंग व मर्डर केस में एडिश्नल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज तरसेम मंगला की कोर्ट में आरोपी तेजिंदर सिंह उर्फ गंजू को ताउम्र कैद की सजा सुनाई डाली। अपना फैसला सुनाते हुए जज तरसेम मंगला ने भरी अदालत में आरोपी को कहा कि वह मरते दम तक जेल में रहे। पढ़ें क्या था पूरा मामला ...
-बता दें कि 27 अक्टूबर को फेज-9 में पार्क से छह वर्षीय महरम सिंह अगवा हो गया था। परिजनों ने पुलिस को इसकी शिकायत दी थी।
-बच्चे की मां ने बच्चे के दादा पर ही उसे किडनैप करने का शक जताया था। बच्चे की मां हरिंदर कौर ने पुलिस को दी शिकायत में बताया था कि बच्चे का पिता ऑस्ट्रेलिया में रहता है, जबकि उसके ससुर खरड़ में रहते हैं।
-उसका पति से तलाक का केस चल रहा है और वह फेज-9 में रह रही थी। महरम फेज-11 के नामी प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था। उस दिन शाम करीब 6.15 बजे के करीब महरम पार्क में खेल रहा था।
-वहीं से वह अचानक लापता हो गया। उन्होंने महरम की काफी तलाश की, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला। इसके बाद उसने पुलिस को बच्चे के लापता की सूचना दी गई थी। थोड़े दिनों बाद महरम का शव सेक्टर 69 में कूड़ेदान के पास मिला था।
-चिकित्सीय जांच में शव की पहचान हो चुकी थी। डीएसपी नवरीत विर्क ने शव महरम का होने की पुष्टि कर दी थी। सेक्टर 69 में रखे कूड़ादान में कूड़ा डालने आए व्यक्ति ने ने मिट्टी में एक शूज़ निकला हुआ देखा।
-किसी अनहोनी की आशंका से उसने तुरंत पुलिस को फोन किया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर मामले की जांच की और कुछ दिन में पाया कि फेज-9 में उनके पड़ोसी तेजिंदर सिंह उर्फ गंजू ने ही किडनैप कर मर्डर किया था। पुलिस ने गंजू को गिरफ्तार कर मामला दर्ज कर दिया था।  

200 करोड़ से होगा बरनाला शहर का कायाकल्प: राजिंदर गुप्ता

बरनाला| ---पंजाब योजना बोर्डपंजाब के वाइस चेयरमैन, शिअद महासचिव एवं ट्राइडेंट के संस्थापक पद्मश्री राजिंदर गुप्ता ने कहा कि राजनीति में आने का उनका मकसद जिला बरनाला को मोहाली, लुधियाना, पटियाला बठिंडा जैसे शहरो की कतार में खड़ा करना है। 

उन्होंने कहा कि बरनाला शहर का 200 करोड़ की लागत से कायाकल्प किया जाएगा। शहर में सरकारी कॉलेज, टैक्सटाइल हब जैसे बड़े प्रोजेक्ट लगाए जाएंगे। प्रदेश के डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल से उनकी नजदीकी का फायदा हरेक शहरवासी को मिलेगा। एक सवाल के जवाब में राजिंदर गुप्ता ने कहा कि शहर में जो बी काम अधूरे पड़े हैं उन्हें पुरा करवाया जा रहा है और जो नींव पत्थर रखे गए हैं उन पर भी काम जल्द शुरू होगा। 

जोधपुर में पतरकारो ने खबर रोकने की मांगी कीमत

जोधपुर : शिव सेना जिला प्रमुख नेमाराम पटेल ने जोधपुर में कार्यरत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तीन पत्रकारों पर ब्लैकमेल कर पैसे मांगने का लगाया आरोप। नेमाराम ने दैनिक भास्कर के रिपोर्टर रणबीर चौधरी, मनोज वर्मा और सहारा समय न्यूज़ चैनल के प्रदीप जोशी के खिलाफ महा मंदिर थाने में रिपोर्ट दी। इसमें कहां गया है कि उक्त व्यक्तियों ने उसकी एक वीडियो क्लिपिंग दिखाकर कहा कि यह खबर अखबार और इलेक्टॉनिक मीडिया में आ गई तो तुमारा राजनैतिक कैरियर समाप्त हो जाएगा। अगर तुम चाहते हो कि खबर रोक दी जाए तो हम यह खबर रोकने के एवज में पैसे लेंगे। फिर उन्होंने पहले 60 हजार और उसके बाद इसकी दुगनी राशि रिश्वत में मांगी। शिव सेना नेता की दी हुई इस रिपोर्ट पर महामंदिर पुलिस कर रही है जांच।
यह भी कहा जा रहा है कि दैनिक भास्कर, सहारा समय के अलावा न्यूज़ नेशन और DNA के पत्रकारों ने भी जोधपुर शिवसेना जिला प्रमुख नेमाराम पटेल से खबर दबाने के एवज में 60 हजार रूपये मांगे। मामला 15 जनवरी का है। एक शादी समारोह में शिरकत करने पहुंचे जिला प्रमुख ने अपनी एयर पिस्टल से म्यूजिक सिस्टम पर थिरकते हुए हवाई फायर किये थे। वीडियो का मामला दैनिक भास्कर के रिपोर्टर रणवीर चौधरी और मनोज वर्मा के पास कब पहुंचा, जानकारी नहीं। लेकिन 10 फ़रवरी से शिवसेना जिला प्रमुख को भास्कर एवम सहारा समय, न्यूज़ नेशन की ओर से पटेल का राजनीतिक कैरियर समाप्त करने के लिए फोन आने शुरू हुए और 11 फ़रवरी की सांय 5 बजे तक 60 हजार रूपये पहुंचाने की डेड लाइन दे दी गई।
साथ ही कहा गया कि यदि आपने हमे 60 हजार दे दिए तो 4-5 इलेक्ट्रॉनिक एवं एक प्रिंट मीडिया आपको हीरो बना देगा। ये पैसे हमें नहीं चाहिए, दैनिक भास्कर को देने हैं। हम लोग 12 फ़रवरी तक जवाब का वेट करेंगे नहीं तो देख लेना। 12 / 2 को सांय 5 बजे के बाद दैनिक भास्कर और न्यूज़ नेशन, सहारा समय, दैनिक भास्कर से पटेल के पास फोन आने शुरू हुए। पैसे न होने और डांस वीडियो में कुछ नहीं के चलते उन्होंने कॉल नहीं लिया। 13 /2 की सुबह दैनिक भास्कर ने पेज नम्बर 2 पर नेमा राम की फ़ोटो एयर पिस्टल चलाते हुए खबर छाप दी। 14 / 2 को यही खबर उसी पेज पर फिर छापी गई जो यह साबित करती है कि रिपोर्टरों की नीयत ठीक नही थी।
नेमाराम ने उसी रोज दैनिक भास्कर के चीफ रिपोर्टर मनोज वर्मा, रणवीर चौधरी एवं न्यूज़ नेशन के प्रदीप जोशी के खिलाफ महामंदिर थाने में शिकायत दी। पत्रकरों की ओर से धमकी और माफ़ी मांगने का ऑडियो वायरल हो चुका है। लेकिन पुलिस-मीडिया-माफिया ने आज तक उनकी fir दर्ज नहीं होने दी। नेमाराम ने इन दो रिपोर्टरों के साथ ही जोधपुर दैनिक भास्कर में जमे कारोबारी रिपोर्टर डी डी वैष्णव, भंवर जांगिड़, कमल वैष्णव, प्रवीण धींगरा के बढ़ते कारोबार की जांच की मांग कर भास्कर MD सुधीर अग्रवाल और विजिलेंस को प्रूफ भेजकर नौकरी से निकालने की मांग की है। 

Monday, November 16, 2015

साबुनों में चर्बी के प्रयोग पर शिकंजा नहीं कसा तो करेंगे आंदोलन : अनिल बंसल नाणा


गोसेवा संघ पंजाब के महासचिव अनिल बंसल नाणा ने रविवार को बरनाला की अग्रवाल धर्मशाला में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि पंजाब में कई साबुन बनाने की फैक्ट्रियों में नहाने और कपड़े धोने के साबुन में पशु चर्बी खासकर गाय की चर्बी का इस्तेमाल किया जा रहा है। 

नाणा ने कहा कि पूरे प्रदेश में पिछले दो माह में 16 ट्रक पशु और चर्बी के पकड़े गए हैं, जिनमें पशु और गाय की चर्बी पाए जाने का अंदेशा है। उन्होंने कहा कि सभी के सैंपल लेकर टेस्ट के लिए भेजे जा चुके हैं और रिर्पोट आने का इंतजार है। 

उन्होंने बताया कि पंजाब में कुछ साबुन फैक्ट्रियों के मालिक भी लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। नाणा ने कहा कि वैसे तो साबुन में विशेष तेल का इस्तेमाल होता है जोकि विदेश से आता है और 300 रुपए प्रति लीटर की कीमत पर उपलब्ध होता है जबकि इस तेल के प्रयोग की जगह साबुन फैक्ट्रियों के मालिक पशु चर्बी का प्रयोग कर रहे हैं। नाणा ने कहा कि जानकारी के अनुसार जो कंपनी पशु चर्बी सप्लाई कर रही है उसका पंजाब में 55 करोड़ रुपए का व्यापार है। नाणा ने कहा कि इस संबंधी सीएम प्रकाश सिंह बादल से भी बात हो चुकी है और उन्होंने 16 नवंबर को मिलने का समय दिया है। सीएम को इस गौरख धंधे बारे अवगत कराया जाएगा। लुधियाना, जालंधर, राजपुरा, बठिंडा, अमृतसर, पटियाला जैसे शहरों में 50 के करीब ऐसी बड़ी साबुन फैक्ट्रियां हैं जो पशु चर्बी का इस्तेमाल करती हैं। इस मौके पर सचिव वकील चंद गोयल, गोरक्षा दल के वाइस प्रधान मोनू गोयल, सचिव मुनीश मिंटा, विकास जिंदल, सरफराज आदि मौजूद थे। 

Monday, November 9, 2015

बिहार में नितीश लालू ने मरी बाजी ,बीजेपी चारो खाने चिट

पटना. तमाम अटकलों और एग्जिट पोल्स को दरकिनार कर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने बिहार विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत दर्ज दी। विधानसभा की 243 सीटों में से महागठबंधन ने 178 सीटों पर बंपर जीत हासिल की। आरजेडी को 80, जेडीयू को 71 और महागठबंधन की तीसरी पार्टी कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं। दूसरी ओर, एनडीए को करारी हार का सामना करना पड़ा। दिवाली के ठीक पहले महागठबंधन की इस जीत ने भाजपा गठबंधन को तगड़ा झटका दिया। एनडीए को 58 सीटें हीं मिली।
महागठबंधन को क्लीन स्वीप, भाजपा को सिर्फ पांच
फर्स्ट फेज में पहला बड़ा मुद्दा रहा विशेष पैकेज। पीएम मोदी ने 6 रैलियां की। 36 सीटों तक पहुंचे। वहीं, महागठबंधन ने पैकेज की घोषणा के बहाने बिहारियों की बोली लगाने को मुद्दा बनाया। डीएनए विवाद भी उछाला। एनडीए का अति आत्मविश्वास पहले चरण में ही उसके लिए घातक साबित हुआ। 2010 के परिणाम के आधार पर कुल 49 में से सिर्फ 13 सीटें एनडीए के पाले में थीं। 34 सीटों पर जीत बरकरार रखने की चुनौती महागठबंधन के सामने थी। एनडीए इस मुगालते में रहा कि धुआंधार प्रचार और घटक दलों के कुछ दिग्गजों के चलते पुरानी सीटों के अलावा कम से कम 10 नई सीटें उसके खाते में आ जाएंगी। लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस और हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी मैदान में थे। दोनों हारे।
दूसरा चरण : रिजर्वेशन जैसे मुद्दों ने महागठबंधन को दी बढ़त
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा का बयान क्या दिया, लालू-नीतीश को निर्णायक मुद्दा मिल गया। वहीं, भाजपा ने बीफ पर लालू वाले बयान पर घेरा। शैतान के जवाब में ब्रह्मपिशाच और राक्षस जैसे बयान आए। हम के जीतन राम मांझी, रालोसपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. अरुण कुमार और जहानाबाद के पूर्व सांसद डा. जगदीश शर्मा का प्रभाव क्षेत्र होने के बावजूद एनडीए को सफलता नहीं मिली। इनके दम पर सवर्णों के अलावा महादलित, चंद्रवंशी और कुशवाहा बिरादरी के वोटों का आसरा एनडीए को था, लेकिन यह समीकरण काम नहीं आया।
तीसरा चरण : दाल के मुद्दे पर महंगाई ने बीजेपी को दी पटखनी
दाल की बढ़ती कीमत को महागठबंधन ने मुद्दा बनाया। घर की मुर्गी दाल बराबर जैसे सियासी तीर चले। हरियाणा में दलित बच्चों की मौत पर केंद्रीय मंत्री वीके सिंह के बयान का महागठबंधन ने अच्छे से फायदा उठाया। विधानसभा के पिछले चुनाव परिणाम को देखें तो इस फेज में महागठबंधन और एनडीए के बीच बराबरी की टक्कर हो सकती थी। कुल 50 में से 19 सीटें भाजपा के पास थी। जदयू की जीत 23 सीटें थीं। राजद का सात सीटों पर कब्जा था।
चौथा चरण : 56 में 26 लाकर भाजपा ने बचाई लाज
इस फेज में जिन इलाकों में चुनाव हुआ, वो एनडीए के आधार इलाकों में आता है। कुल 55 में से 26 सीटें भाजपा के पक्ष में थी। पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, गोपालगंज और सीवान जिलों से एनडीए को पहले से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। यह नहीं हो सका। बेतिया में भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेणु देवी को हार का सामना करना पड़ा। फिर भी चंपारण में एनडीए की इज्जत कुछ हद तक बच पाई। थारुओं के बीच राज्य सरकार की नाराजगी का लाभ एनडीए को मिला। पूर्णमासी राम एवं वैद्यनाथ प्रसाद महतो जैसे दिग्गजों की हार से महागठबंधन को भी झटका।
पांचवां चरण : गाय और ओवैसी का भी नहीं मिला लाभ
मुस्लिम बहुल सीटों वाले इस दौर में भाजपा ने धार्मिक आरक्षण का मुद्दा उठाया। गाय का विवादित विज्ञापन छपवाया। ओवैसी भी मैदान में थे। लेकिन बीजेपी को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण का कोई फायदा नहीं हुआ। 57 में से 23 सीटों पर भाजपा का कब्जा था। लोजपा के खाते में भी दो सीटें थीं। इस लिहाज से देखें तो अपनी 25 सिटिंग सीटों को बचाने के अलावा कुछ अधिक सीटों पर जीत हासिल करना एनडीए का लक्ष्य था। एनडीए ने बढ़े हुए वोट को एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर से जोड़कर अपने पक्ष में माना। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।बिहार में नितीश लालू ने मरी बाजी ,बीजेपी चारो खाने चिट 

Tuesday, November 3, 2015

विदेश भेजने के नाम पर सैकड़ों युवकों से करोड़ों रुपए ठग कर कंपनी भागी

अमृतसर। विदेश भेजने के नाम पर लोगों से करोड़ों रुपए इकट्ठे कर मर्चेंट ला ओवरसीज नाम की कंपनी दफ्तर को ताला लगाकर फरार हो गई। इस कंपनी का दफ्तर कोर्ट रोड स्थित दीप काम्प्लैक्स में है, जहां पर अब ताला लगा हुआ है। कंपनी के सभी फोन नंबर भी डिसकनेक्ट कर दिए गए हैं। सोमवार को राज्य के विभिन्न जिलों से आए सौ से ज्यादा युवकों ने अपनी लिखित शिकायत पुलिस कमिश्नर जतिंदर सिंह औलख को दी है। इन युवकों का कहना है कि इस इमीग्रेशन कंपनी ने अलग-अलग देशों में भेजने और वहां पर काम करवाने का विश्वास दिलवाया। बदले में किसी से 2 लाख रुपए तो किसी से 5 लाख रुपए लिए हैं, लेकिन किसी भी युवक को विदेश नहीं भेजा।

पुलिस कमिश्नर दफ्तर पहुंचे लुधियाना निवासी जसबीर सिंह, मनप्रीत सिंह निवासी तरनतारन, भूपिंदर सिंह निवासी अजनाला रोड, अंकुश शर्मा, इकबाल सिंह निवासी इस्लामाबाद, राजदीप सिंह निवासी नाभा, सुखविंदर सिंह निवासी पठानकोट सहित 100 से ज्यादा युवकों ने बताया कि उक्त कंपनी विभिन्न अखबारों में लगातार इश्तिहार दे रही थी। इनमें लिखा होता था कि न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, कैनेडा, दुबई, यूके आदि देशों में जाने और वहां पर नौकरी करने के लिए संपर्क करें। इसके साथ ही उक्त सभी देशों में पीआर दिलवाने का भी भरोसा दिलवाया जाता था। कंपनी के दफ्तर का पता 27-28 दुकान नंबर दीप काॅम्प्लैक्स कोर्ट रोड बताया गया था। इश्तिहार पढ़कर उन लोगों ने यहां पर फोन कर संपर्क किया तो आगे से कहा गया कि दफ्तर में विजिट करें। उन लोगों ने दफ्तर में विजिट की। वहां पर तैनात स्टाफ ने उन्हें विभिन्न देशों में भेजने और पक्का काम दिलवाने का विश्वास दिलवाया। विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग फीस बताई गई। इस उनसे रुपए ले लिए। आरोपियों ने अपना बैंक अकाउंट नंबर 50200014037085 दिया। इसमें कि पैसे ट्रांसफर करवाने के लिए कहा गया। उन सभी ने इस खाते में पैसे जमा करवा दिए। उनके पासपोर्ट सारे ओरिजनल दस्तावेज भी अपने पास रख लिए। करीब दो महीने बाद भी उन्हें विदेश भेजा गया। वह फोन पर संपर्क करते तो आगे से जवाब मिलता कि फाइल भेजी हुई है। 31 अक्टूबर को वे सभी कंपनी के दफ्तर पहुंचे तो पता लगा कि आरोपी यहां ताला लगाकर फरार हो गए हैं।

पुलिस कमिश्नर जतिंदर सिंह औलख ने कहा कि मामले की जांच शुरू करवा दी है। कंपनी को कौन लोग चला रहे थे। इसका पता लगाकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इमिग्रेशन कंपनी खोलने से पहले विदेश मंत्रालय से रजिस्ट्रेशन करवानी पड़ती है। इसलिए वेरिफाई कर लें कि जिस कंपनी को आप पैसे देने जा रहे हैं कि वह मंत्रालय में रजिस्टर्ड हो। बिना किसी पुख्ता जांच के कोई पैसा दिया जाए। इसके अलावा इमीग्रेशन वाले अखबारों में इश्तिहार देकर लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। इसमें पुलिस की भी जिम्मेदारी बनती है कि इस तरह के इश्तिहार देने वाले लोगों की प्रॉपर स्कैनिंग करवाई जाए।

Friday, October 16, 2015

बीफ पर बहस करने से पहले पढ़ें इससे जुड़े वैज्ञानिक तथ्य

गोमांस के कारण बीफ का मुद्दा देश में गर्माया हुआ है। राजनेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं और उनके गुर्गे आम जनता के बीच एक दूसरे के प्रति जहर घोलने का काम कर रहे हैं। और वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं कि बीफ के मानव शरीर या पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ते हैं। इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बीफ नहीं खाने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। आप चौंक जरूर गये होंगे, लेकिन यह सच है। चलिये पर्यावरण से जोड़ कर बीफ से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों से हम आपको रू-ब-रू करवाते हैं। ये तथ्य यूएनईपी और येल यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के हवाले से हैं। दिल्ली से आगरा तक कार से जाते हैं, तब जितना कार्बन एमिशन होता है, उतना एक किलोग्राम बीफ से होता है। बीफ के बढ़ते व्यापार के कारण पशुपालन भी बढ़ा यानी पर्यावरण कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बढ़ी जो उनके पाद से निकलती है। भारत में ज्यादातर पशुओं का पालन-पोषण उन्हें काटने के लिये नहीं दूध और खेती के लिये किया जाता है। दुनिया में उत्सर्जित होने वाली ग्रीन हाउस गैसों की 18 प्रतिशत तो पशु मांस से ही होती है। जबकि यातायात की वजह से 15%। यूएन कहता है कि बीफ खाने वाले लोग पर्यावरण प्रेमी नहीं होते हैं, लेकिन बीफ खाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। गाय या भैंस का 
मीट पर्यावरण के लिये नुकसानदायक होता है। मीट की वजह से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित होती हैं।

मोहन भागवत कैसे बनें मोदी के 'कृष्ण'?

देश के सबसे ताकतवर हस्ती हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. लोकसभा चुनाव में जीत के बाद से ही राजनीतिक के आसमान पर सबसे चमकदार चेहरा बन कर चमक रहे हैं नरेंद्र मोदी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजनीति की दुनिया से अलग देश में दूसरा सबसे ताकतवर शख्स कौन हैं? दरअसल मोहन भागवत वो शख्स भी है जिन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे अहम रोल निभाया है.

 
देश के सबसे बड़े संगठन, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ को चलाते हैं. उनका संगठन, आरएसएस यूं तो जाहिरी तौर पर राजनीतिक गतिविधियों से परहेज करता है लेकिन बीजेपी को चुनावी जंग जिताने में पर्दे के पीछे आऱएसएस औऱ उसके प्रमुख मोहन भागवत का सबसे अहम योगदान माना जाता है. मोहन भागवत का नाम यूं तो मीडिया में कभी-कभार ही चमकता है लेकिन केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से वो अक्सर अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं. पिछले दिनों आरक्षण के मुद्दे पर उनके ताजा बयान ने एक बार फिर देश में राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ यानी आरएसएस को देश के सबसे बड़े संगठनों में से एक माना जाता है. आरएसएस की कमान संघ प्रमुख मोहन भागवत के हाथों में हैं. भागवत साल 2009 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख बने थे लेकिन संघ प्रमुख बनने के बाद से ही वो अपने बयानों को लेकर ही ज्यादा चर्चा में रहे हैं. केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद हिंदुत्व पर दिए उनके बयान को लेकर भी हंगामा खड़ा हो गया था और अब आरक्षण के मुद्दे पर उनके बयान ने देश की राजनीति को गर्मा दिया है. 

गुजरात में पटेल समुदाय को आरक्षण देने के लिए शुरु हुए आंदोलन का नाम लिए बगैर भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग उठाई है. आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर को इंटरव्यू देते हुए मोहन भागवत ने कहा है कि आरक्षण को हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है. लोग अपनी सुविधा के मुताबिक अपने समुदाय या वर्ग का ग्रुप बनाते हैं और आरक्षण की मांग करने लगते हैं. लोकतंत्र में कई नेता उनका समर्थन भी करते हैं. एक गैर राजनीतिक समिति का गठन होना चाहिए जो समीक्षा करे कि किसे आरक्षण की ज़रूरत है और कब तक?

बिहार चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान को लेकर आरोप प्रत्यारोप का एक नया दौर शुरु हो गया है. आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों में तलवारें खिंचती रही हैं और आरक्षण की ये बहस आजादी के वक्त से ही चलती रही है. दरअसल आजादी के बाद जब भारत का संविधान बना तो दलितों और आदिवासियों को मुख्य धारा में लाने के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी.

आजाद भारत का संविधान लागू होते ही एससी यानि अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी और एसटी यानि अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई. इस हिसाब से देश में आरक्षण 49.5 फीसदी हो गया और सामान्य वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 50.5 का हिस्सा रह गया.

लेकिन आजादी के 60 साल बाद आज भी देश में अलग-अलग समुदाय के लोग आरक्षण की मांग का झंडा बुलंद किए हुए हैं. इन दिनों आरक्षण की ताजा आग गुजरात में लगी है जहां हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदार समाज खुद को ओबीसी वर्ग में शामिल कराना चाहता है ताकि कॉलेज और सरकारी नौकरियों में उन्हें कोटा मिल सके.


गुजरात में पटेल तो राजस्थान में गुर्जर भी लंबे वक्त से आरक्षण की मांग करते रहे हैं. राजस्थान में बीजेपी की सरकार ने पिछले दिनों गुर्जरों को 5 फीसदी और अगड़ों में आर्थिक रूप से पिछड़ों को 14 फीसदी का आरक्षण देने के लिए दो बिल भी पास कर दिए हैं. खास बात ये है कि इन बिलों के पास होने के बाद अब राजस्थान में 68 फीसदी आऱक्षण हो गया है. जो सुप्रीम कोर्ट की 50 फीसदी आरक्षण देने की सीमा को पार कर गया है और यही वजह है कि देश में आरक्षण के मुद्दे पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है.


गुजरात में पटेल समाज से पहले भी आरक्षण की मांग पर आंदोलन होते रहे हैं और सरकारें इन मांगों के सामने झुकती भी रही हैं. महाराष्ट्र में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसला हुआ था लेकिन हाईकोर्ट ने मराठों को आरक्षण के फैसले पर रोक लगा रखी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार के उस फैसले को निरस्त कर दिया था जिसमें जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल किया जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “जाति एक महत्वपूर्ण वजह है लेकिन सिर्फ जाति पिछड़ापन तय करने का मानक नहीं हो सकती. पिछड़ापन सामाजिक होना चाहिए, सिर्फ शैक्षिक और आर्थिक नहीं.“लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल और फैसले के बाद भी आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ चुका है और आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कह कर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है.

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला नरेंद्र मोद जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस समय गुजरता के अंदर एक नई आरक्षण की नीति लाए जहां आरक्षण को जिला स्तर तक उन्होंने सीमित कर दिया. और उन पदों को इंटरचेंजजेबल बनाने से इंकार कर दिया. और यहां तक कि गुजरात में ग्राम पंचायतों में भी अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्गों के लोगों को उन्होने आरक्षण से महरुम कर दिया. तो जो देश के भाजपा के सबसे अग्रिम नेता हैं अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गो को जिस पक्ष का वो होने का दम भरते हैं. ये उनका रवैया था. और शायद आज भी है. और यही रवैया उनके मार्गदर्शक आरएसएस के सरसंघचालक का भी है.

आरक्षण के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत विवादों में है लेकिन उनको लेकर विवाद पहली बार नहीं छिड़ा है उनके विवादों की ये कहानी भी हम आपको सुनाएंगे आपको आगे लेकिन उससे पहले देखिए देश की मौजूदा राजनीति में मोहन भागवत होने का क्या है मतलब.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है. जिससे करीब तीन दर्जन छोटे बडे संगठन जुड़े हुए हैं इन संगठनों का दायरा पूरे देश में फैला हुआ है. देश के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन में से एक भारतीय मजदूर संघ, जिसके करीब दस लाख सदस्य हैं. देश का सबसे बडा विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और देश की रूलिंग पार्टी भारतीय जनता पार्टी जैसे संघ के कई और संगठन है. जिन्हें संघ परिवार कहा जाता है. संघ परिवार देश भर में शिक्षा, जनकल्याण और हिंदू धर्म से जुड़े कार्यक्रमों समेत कई क्षेत्रों में हजारों प्रोजेक्ट चला रहा है. और संघ परिवार के इन सारे कार्यक्रमों औऱ उद्देश्यों के लिए दिशा निर्देश देना और उनका वैचारिक मार्गदर्शन करने का काम राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सरसंघचालक का होता है.


मोहन भागवत साल 2009 में जब सरसंघचालक बने थे उस वक्त बीजेपी लोकसभा चुनाव हार चुकी थी. लेकिन भागवत ने हार नहीं मानी वो ना सिर्फ बीजेपी में जबरदस्त बदलाए लाए बल्कि उन्होंने संघ परिवार को चुनावी जंग में बीजेपी की मदद के लिए तैयार भी किया गया. मोहन भागवत कैसे बने संघ के सरताज और कैसे उन्होंने हारी और थकी हुई बीजेपी में फूंक दी एक नई जान?

दरअसल मोहन भागवत ने भारत को हिंदू राष्ट्र बोल कर नए विवाद को जन्म दे दिया था. उन्होंने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व उसकी पहचान है और यह अन्य (धर्मों) को स्वंय में समाहित कर सकता है. पिछले साल अगस्त 2014 में मोहन भागवत ने कटक में कथित तौर पर कहा था कि सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश के वर्तमान निवासी इसी महान संस्कृति की संतान हैं. उन्होंने सवाल किया था कि यदि इंगलैंड के लोग इंग्लिश हैं, जर्मनी के लोग जर्मन हैं, अमेरिका के लोग अमेरिकी हैं तो हिंदुस्तान के सभी लोग हिंदू के रुप में क्यों नहीं जाने जाते? हिंदू राष्ट्र, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का सबसे बडा एजेंडा रहा है. ऐसे में हिंदुत्व पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान पर भी घमासान मच गया था. 

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का प्रमुख बनने के बाद से ही भागवत अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं लेकिन 2014 के चुनाव से पहले जब उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुद मोर्चा संभाला तो वो और ज्यादा लाइमलाइट में आ गए थे.

ये धुआं उगलती चिमनियों का शहर है जो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा बिजली पैदा करने के लिए भी पहचाना जाता है और ये शहर चंद्रपुर, संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी शहर है. मोहन भागवत का जन्म तो 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था लेकिन चंद्रपुर की गलियों में ही खेलते- कूदते हुए उनका बचपन गुजरा है. क्योंकि मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत महाराष्ट्र के सतारा से चंद्रपुर में आकर बस गए थे. मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार के स्कूल के दिनों के दोस्त भी थे यही वजह है कि मोहन भागवत का संघ से पुराना नाता रहा है. उनका संघ से ये तीन पीढ़ियों पुराना कनेक्शन है.

चंद्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से मोहन भागवत ने स्कूल की पढाई पूरी की थी. स्कूल के उनके टीचर आज भी उन्हें एक ऐसे विद्यार्थी के तौर पर याद करते हैं जिससे इतनी कामयाबी की उम्मीद उन्हें भी नहीं थी.

चंद्रपुर से स्कूल की पढाई पास करने के बाद उन्हें शहर के ही जनता कॉलेज में बीएससी में एडमीशन ले लिया था लेकिन उन्होंने ग्रेजुएशन की ये पढाई बीच में ही छोड दी और एक साल बाद ही मोहन भागवत ने चंद्रपुर शहर को भी छोड़ दिया. उनकी जिंदगी का पहला अहम पड़ाव बना महाराष्ट्र का शहर आकोला.

मोहन भागवत ने बीएससी की पढाई छोड़कर अकोला के इसी पंजाबराव कृषि विद्यापीठ में वेटनिरी साइंसेज एंड एनीमल हस्जबेंडरी के कोर्स में दाखिला ले लिया था. स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने आगे पोस्ट ग्रेजुएशन की पढाई के लिए इसी कॉलेज में एडमीशन ले लिया था लेकिन 1975 में उन्होंने ये पढाई बीच में ही अधूरी छोड़ दी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दामन थाम लिया. 


मोहन भागवत की तीन पीढ़ियां संघ से जुडी रही है. मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत संघ के स्वयं सेवक थे और उनके पिता मधुकर राव भागवत भी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक रहें है उन्होंने गुजरात में प्रांत प्रचारक के तौर पर भी काम किया है. आम तौर पर संघ के प्रचारक शादी नहीं करते हैं लेकिन जब मधुकर राव भागवत ने शादी करने का फैसला किया तो वह वापस चंद्रपुर आ गए और चंद्रुपर क्षेत्र के कार्यवाह सचिव पद पर रहे. मोहन भागवत की मां मलातीबाई भी संघ की महिला शाखा सेविका समिति की सदस्य थी. खास बात ये भी है कि मुधकर राव भागवत ने ही बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को संघ में दीक्षित किया था. ये है मोहन भागवत की तीन पीढियों की राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से कनेक्शन की कहानी लेकिन अब सुनिए मोहन भागवत के नरेंद्र मोदी से कनेक्शन की ये कहानी. दरअसल जिन दिनों मोहन भागवत के पिता मुधकर राव भागवत गुजरात में संघ के प्रांत प्रचारक हुआ करते थे तब उनके संपर्क में पहली बार आए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

आकोला कें पंजाबराव कृषि विद्यापीठ से एनीमल हसबेंड्री में ग्रेजुएशन करने के बाद मोहन भागवत ने कुछ महीनों के लिए चंद्रपुर में ही एनीमल हसबेंड्री डिपार्टमेंट में नौकरी कर ली थी. क्योंकि ग्रेजुएशन के बाद ये दो साल की इंटर्नशिप जरुरी होती थी. लेकिन जब मोहन भागवत एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे तब 1975 में उन्होंने अचानक बीच में ही पढाई अधूरी छोड़ी दी. ये वो दौर था जब देश में आपातकाल लगाया गया. ऐसे हालात के बीच मोहन भागवत पढ़ाई छोड़ने के बाद फुल टाइम संघ के प्रचारक बन गए.

आपात काल के दौरान मोहन भागवत ने संघ के लिए भूमिग होकर काम किया. 1977 में उन्हें अकोला में ही संघ का प्रचारक बना दिया गया और बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्रों का प्रचारक भी बनाया गया.

1991 में मोहन भागवत संघ कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण के लिए अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख भी बनाए गए और वे इस पद पर 1999 तक रहे. इसी साल उन्हें सारे देश में पूर्णकालिक काम करने वाले संघ कार्यकर्ताओं का प्रभारी, अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, बना दिया गया इस तरह मोहन भागवत संघ में तेजी से तरक्की की सीढ़ियां चढते गए.

मोहन भागवत संघ के प्रचारक है और संघ की परंपरा के मुताबिक उन्होनें शादी भी नहीं की है. साल 2000 में जब राजेंद्र सिंह ऊर्फ रज्जू भय्या और एच पी शेषाद्रि ने सरसंघचालक और संघ सरकार्यवाहक के पद से इस्तीफा दिया तो के एस सुदर्शन संघ के नए सरसंघचालक बने और मोहन भागवत सरकार्यवाहक. और आखिरकार साल 21 मार्च 2009 को भागवत संघ के सरसंघचालक बना दिए गए.

मोहन भागवत को करीब से जानने वाले उन्हें एक विनम्र औऱ व्यावहारिक शख्स के तौर पर पहचानते हैं जो संघ को राजनीति से दूर रखने का नजरिया रखता हैं लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह उन्होंने बीजेपी को जिताने और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुल कर बैटिंग की उसने संघ के राजनीति से दूर रहने के दावे को चर्चा में ला दिया है. भागवत ने कैसे दूर की मोदी के प्रधानमंत्री बनने की राह में आने वाली रुकावटें?

2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बुरी हार हुई थी. हार से बीजेपी और संघ में निराशा का माहौल था तो वही गुजरात में लगातार दो चुनावों में जीत के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की दावेदारी के लिए अपनी तैयारी भी तेज कर दी थी. इसीलिए उस वक्त चुनाव नतीजों के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी प्रेस कांफ्रेस करके अपने इरादे जता दिए थे कि वो बीजेपी में बड़े परिवर्तन चाहते हैं दरअसल हार के बाद संघ के निशाने पर खास तौर पर लाल कृष्ण आडवाणी और उनकी टीम के वो केंद्रीय नेता थे जिन्होंने इन चुनावों की रणनीति बनाई थी.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भाजपा के काम आज के नहीं है, लाखों कार्यकर्ता उनके देश भर में हैं और उन्होंने तपस्या की है इसके चलते उनके पुण्य काम आएंगे ऐसे होता नहीं है. इतने नीचे तक गहराई तक वो काम किया गया है, गांव गांव में लोग मिलते हैं अब अगर गांव में कोई व्यक्ति भाजपा के लिए आखों में आंसू लेकर खड़ा है तो उस पार्टी का पतन नहीं हो सकता जितना होना है.

बीजेपी की हार के बाद ये भी तय किया गया था कि अब पार्टी की कमान लालकृष्ण आडवाणी नहीं बल्कि कोई और संभालेगा लेकिन तब संघ के आगे भी ये सवाल खड़ा था की आडवाणी के बाद आखिर किसे बीजेपी की कमान सौंपी जाए.

वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल बताते हैं कि नरेंद्र मोदी का ब्रांड इक्युटी जो है वो ब्रैड इक्युटी के सामने ना राजनाथ है ना नितिन गडकरी है. बीजेपी का जो अपना संविधान है उसमें तो नरेंद्र मोदी नंबर 1 ब्रैंड है. तो इसलिए आरएसएस ने भी काम्प्रोमाइज किया. उनके जो इएस मैन रोयलिस्ट को छोड़ के एसे एक बन्दे का जिसका एक ब्रैंड है जिसके साथ वर्किग रिलेशनशिप को सुधारा और आगे बढ़ाया तो इसमें मुझे लगता है कि आरएसएस ने सोचा कि नरेंद्र मोदी एक सर्वश्रेष्ठ बेट हैं.

गुजरात में जीत की हैट्रिक लगाने के बाद नरेंद्र मोदी ने 6 फरवरी 2013 को पहली बार दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दी थी. दिल्ली के श्री राम कॉलेज में जब मोदी बोले तो साफ हो गया की अब उनकी अगली मंजिल दिल्ली ही है. लेकिन नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की राह में अभी कई रोड़े बाकी थे और सबसे बडी दीवार बन कर खड़े थे खुद बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी. लेकिन मोदी को लेकर संघ में फैसला हो चुका था. इसीलिए बीजेपी ने भी जून 2013 में उन्हें केंद्रीय चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना कर अपना संदेश साफ कर दिया था.

गुजरात से निकलकर नरेंद्र मोदी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनने में तो कामयाब रहे थे लेकिन मोदी के विरोध में आडवाणी रुके नहीं बल्कि 10 जून को उन्होंने पार्टी के सभी अहम पदों से इस्तीफा भी दे दिया था. औऱ ये पहला मौका था जब संघ ने सीधे तौर पर खुल कर बीजेपी के मामले में दखल दिया. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आडवाणी को समझाने औऱ मनाने के लिए खुद मोर्चा संभाला.

संघ प्रमुख मोहन भागवत का पहला बडा एक्शन तब हुआ था जब नितिन गड़करी को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था और उनका दूसरा बड़ा एक्शन था नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना. यहीं नहीं उन्होंने बीजेपी और संघ के अंदर नरेंद्र मोदी की राह की हर रुकावट को साफ करने में अहम भूमिका निभाई. ये मोहन भागवत की ही रणनीति थी कि संघ कार्यकर्ताओं ने चुनाव में सौ फीसदी वोटिंग का लक्ष्य बनाया औऱ उसे काफी हद तक हासिल भी किया. जिसका नतीजा चुनाव में  बीजेपी की बडी जीत के तौर पर सामने आया है औऱ बीजेपी की इस जीत का सबसे चमकदार चेहरा बनकर उभरे हैं नरेंद्र मोदी लेकिन पर्दे के पीछे इस जीत का हकदार एक चेहरा और भी है. 

तलवारें हवा में लहराकर जबरन बंद करवाई दुकानें

पंजाबबंद की काॅल को लेकर वीरवार को बरनाला में कर्फ्यू जैसे हालात रहे। इस दौरान सदर बाजार में सुबह करीब 9 बजे प्रदर्शनकारियों ने तलवारें लहराते हुए दुकानों को जबरन बंद करवा दिया। विरोध में व्यापारियों ने रेलवे स्टेशन के पास रोष जताया।

व्यापार मंडल के प्रधान अनिल बांसल नाणा, यूथ के प्रधान नरेंदर नीटा, मोनू गोयल, हेमंत बांसल, दीपक मित्तल ने कहा कि वह प्रदर्शनकारियों के साथ हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि व्यापारियों को डराकर उनकी दुकानें जबरन बंद करवाई जाए। इसी बीच प्रदर्शनकारी भी वहां धमके। इसके बाद व्यापारी और प्रदर्शनकारी आपस में भिड़ गए। सूचना मिलते ही एसएसपी उपिंदरजीत सिंह घुम्मण, एसपी स्वर्ण सिंह खन्ना, एसपी हरप्रीत सिंह संधू, डीएसपी पलविंदर चीमां, डीएसपी गुरजोत सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और दोनों गुटों को खदेड़ दिया। 

वहीं सभी सरकारी निजी स्कूल/कालेज, बैंक, प्राइवेट अदारे, पेट्रोल पंप के साथ-साथ बस स्टैंड के गेट पर भी ताला लटका रहा। बस स्टैंड चुंगी इंचार्ज लखविंदर सिंह ने बताया कि वीरवार को सुबह 7 बजे तक केवल 9 बसें ही स्टैंड से अपने गंतव्य के लिए निकली। उसके बाद करीब 500 बसें अंदर ही खड़ी रही। बसें ना चलने से लगभग दो लाख के रेवेन्यू का नुकसान हुआ है। 

हाइवेऔर मेन रोड रहे जाम : बंदके दौरान कचहरी चौक, आईटीआई चौक, टी-प्वाइंट, तर्कशील चौक, स्टैंडर्ड चौक, ठीकरीवाला चौक, रायकोट रोड सहित बरनाला-बठिंडा हाईवे, बठिंडा-चंडीगढ़ हाइवे, बरनाला-लुधियाना हाईवे, बरनाला-मोगा हाईवे, बरनाला-मानसा रोड पर यातायात ठप रहा। शाम तक प्रदर्शनकारी सड़कों पर धरना लगाकर बैठे रहे। इस दौरान स्टैंडर्ड चौक पर मरीज को बठिंडा लेकर जा रही एयरफोर्स की एंबुलेंस को प्रदर्शनकारियों ने रोक लिया, लेकिन पुलिस के पहुंचने के बाद एंबुलेंस को जाने दिया गया। एसएसपी उपिंदरजीत सिंह घुम्मण ने कहा कि हालात अब सामान्य हैं। किसी को भी कानून हाथ में नहीं लेने देंगे। 

बरनाला भाजपाजिला प्रधान गुरमीत सिंह हंडियाया ने कहा कि कोटकपूरा में पुलिस की कार्यशैली को लेकर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को आम लोगों से माफी मांगनी चाहिए। बजरंग दल के जिला संयोजक नीलमणि समाधिया ने भी गांव बरगाड़ी के मामले की निंदा की है। 
पूर्वसांसद राष्ट्रीय सिख संगत के मालवा इंचार्ज एडवोकेट राजदेव सिंह खालसा ने कहा कि बादलों ने सियासी फायदे के लिए कोटकपूरा मामले को जानबूझकर उलझाया। इसलिए घटना की जांच सीबीआई से करवाई जानी चाहिए। खालसा ने दावा किया कि 22 सितंबर को डेरामुखी से मुम्बई में सुखबीर बादल श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार गुरमुख सिंह की अभिनेता अक्षय कुमार के घर पर मुलाकात हुई थी। 
 पंजाबमें रोजाना बिगड़ रहे हालातों को देखते हुए केन्द्र सरकार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर देना चाहिए। यह बात आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने वीरवार शाम को भदौड़ में बरनाला-बाजाखाना रोड पर जाम लगाए बैठे लोगों सेे कही। सांसद मान ने कहा कि पंजाब में अमन-कानून की स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी है।

Thursday, October 15, 2015

पंजाब में भड़की हिंसा, छतों से फेंकी पुलिस पर बोतलें, फूंकी बसें

फरीदकोट (पंजाब). पंजाब के फरीदकोट जिले के बरगाडी गांव में गुरु ग्रंथ साहिब के पन्ने फाडऩे और गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी का मामला हिंसा में तबदील हो चुका है। दो दिन से पंजाब सुलग रहा है। सिख संगठन और पुलिस दोनों ही एक-दूसरे पर पथराव कर रहे हैं। मंगलवार को मोगा और बुधवार को फरीदकोट में जमकर लाठीचार्ज हुआ और स्थिति पर काबू पाने के लिए वाटर केनन का प्रयोग किया गया। सिख समुदाय के लोग पुलिस की और वहां से गुजर रही गाडिय़ों को आग लगा रहे हैं तो उधर, जवाब में पुलिस वाले भी गाडिय़ों में तोडफ़ोड़ करते देखे जा रहे हैं। खबर तो यहां तक आ रही है कि बुधवार को पुलिस के ऊपर छतों से बोतलें फेंकी गई और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के हथियार भी छीन लिए है।

जानकारी के मुताबिक, बुधवार को फरीदकोट के कोटकपुरा में भी सिख समुदाय के लोग धरना-प्रदर्शन कर रहे थे कि पुलिस ने उनको उठाने के लिए सिखों पर लाठीचार्ज कर दिया, जिससे माहौल खराब हो गया और लोगों ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया है। पुलिस की गाडिय़ा तोड़ दी। आने-जाने वाले ट्रक के शीशे भी तोड़ दिए। पुलिस की गाडिय़ा पलटा दी, वहीं पुलिस ने कई राउंड फायर किए। इस हिंसा में लाठीचार्ज और पथराव में कई पुलिसवाले और लोग घायल हो गए हैं।

उधर, सिख अगुओ का कहना की हम लोग शांत ढंग से अपना रोष-प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने यहां लाठीचार्ज कर दिया। हमारी मांग है कि गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करने वाले लोगों पर कार्रवाई की जाए।

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