Friday, January 21, 2011

जानिए पूरा बोफोर्स घोटाला

बोफोर्स घोटाले ने राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है। प्रमुख विपक्षी दल को भ्रष्टाचार पर चल रहे महाभारत में एक और बाण चलाने का मौका हाथ लग गया है। आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि इस मामले में स्वर्गीय विन चड्ढा और इटली के व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोच्चि को 41 करोड़ रुपए की दलाली दी गई थी। लिहाजा, इस आय पर भारत में कर चुकाना उनका या वारिस का दायित्व बनता है। जबकी आज दिल्ली हाईकोर्ट में सीबीआई की क्वात्रोच्चि के खिलाफ आपराधिक मामलों को निरस्त किए जाने की अर्जी पर सुनवाई है। आइए हम आपको बताते है क्या है कहानी बोफोर्स घोटाले की....



क्या थी बोफोर्स डील ?

24 मार्च 1986: भारत सरकार और स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 155mm की 400 होवित्जर फील्ड गन की आपूर्ति के लिए 15 अरब अमेरिकी डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट।

बोफोर्स तोप दलाली मामले में कब हुआ खुलासा ?

सन् 1987 में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स काण्ड के नाम से जाना जाता है।

किन पर लगा आरोप ?

सीबीआई ने विन चड्ढा, क्वात्रोची, पूर्व रक्षा सचिव एसके भटनागर और बोफोर्स के पूर्व प्रमुख मार्टिन अर्बदो के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।

किसने की जांच ?

6 अगस्त 1987 – मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन। 30 जनवरी 1997 – सीबीआई ने जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया।

सरकार की साख और सीबीआई पर उठा सवाल

20 अप्रैल 1987: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लोकसभा को आश्वस्त किया कि बोफोर्स मामले में कोई बिचौलिया नहीं था और किसी को कोई दलाली नहीं दी गई।

घोटाले के खुलासे का असर यह हुआ कि 1989 में कांग्रेस की सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा । काफी समय तक राजीव गांधी का नाम भी इस मामले के अभियुक्तों की सूची में शामिल रहा लेकिन उनकी मौत के बाद नाम फाइल से हटा दिया गया। सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी गयी लेकिन सरकारें बदलने पर सीबीआई की जांच की दिशा भी लगातार बदलती रही। एक दौर था, जब जोगिन्दर सिंह सीबीआई चीफ थे तो एजेंसी स्वीडन से महत्वपूर्ण दस्तावेज लाने में सफल हो गयी थी। जोगिन्दर सिंह ने तब दावा किया था कि केस सुलझा लिया गया है। बस, देरी है तो क्वात्रोक्की को प्रत्यर्पण कर भारत लाकर अदालत में पेश करने की। उनके हटने के बाद सीबीआई की चाल ही बदल गयी। इस बीच कई ऐसे दांवपेंच खेले गये कि क्वात्रोक्की को राहत मिलती गयी। दिल्ली की एक अदालत ने हिंदुजा बंधुओं को रिहा किया तो सीबीआई ने लंदन की अदालत से कह दिया कि क्वात्रोक्की के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं हैं। अदालत ने क्वात्रोक्की के सील खातों को खोलने के आदेश जारी कर दिये। नतीजतन क्वात्रोक्की ने रातों-रात उन खातों से पैसा निकाल लिया।

2007 में रेड कार्नर नोटिस के बल पर ही क्वात्रोक्की को अर्जेन्टिना पुलिस ने गिरफ्तार किया। वह बीस-पच्चीस दिन तक पुलिस की हिरासत में रहा। सीबीआई ने काफी समय बाद इसका खुलासा किया। सीबीआई ने उसके प्रत्यर्पण के लिए वहां की कोर्ट में काफी देर से अर्जी दाखिल की। तकनीकी आधार पर उस अर्जी को खारिज कर दिया गया, लेकिन सीबीआई ने उसके खिलाफ वहां की ऊंची अदालत में जाना मुनासिब नहीं समझा। नतीजतन क्वात्रोक्की जमानत पर रिहा होकर अपने देश इटली चला गया। 31 दिसंबर 2005 सीबीआई ने माना कि उन्हें क्वात्रोची के लंदन के दो बैंक एकाउंट की रकम और बोफोर्स की रिश्वत का कोई संबंध नहीं मिला।

एक तरफ सीबीआई ने क्वात्रोक्की को बोफोर्स मामले में दलाली खाने के मामले में क्लीन चिट दे दी है। तो दूसरे तरफ आयकर ट्रिब्यूनल कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।

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