Monday, November 15, 2010

चीन की चुनौती

मैत्रीपूर्ण पड़ोसियों और शक्तिशाली मित्र का होना रणनीतिक नजरिये से उपयोगी है। अपनी भारत यात्रा के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जो अच्छी-अच्छी बातें कहीं, उनके बावजूद भारत को दक्षिण एशिया और एशिया प्रशांत क्षेत्र में रणनीतियों के निर्धारण के लिए अपनी ताकत और कमजोरियों पर ही ध्यान केंद्रित करना होगा।

ओबामा की तीन दिवसीय भारत यात्रा को दो तरह से देखा जा सकता है। एक तो भारत-अमेरिका संबंधों पर इसका प्रभाव और दूसरा विस्तृत परिप्रेक्ष्य में इसके मायने। एक तरफ जहां व्यापारिक सौदों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए अमेरिका द्वारा हमें दिए गए समर्थन (फिर चाहे वह समर्थन ठोस होने के बजाय महज प्रतीकात्मक ही क्यों न हो) ने इन दोनों देशों के संबंधों को नए आयाम दिए हैं, वहीं इसके क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं पर भी गौर किया जाना चाहिए। वास्तव में भारत-अमेरिका संबंधों के लिए ओबामा यात्रा जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं ज्यादा उसका महत्व क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्यों में है।

ओबामा की यात्रा ने इस तथ्य की ताईद कर दी है कि हम एक बदली हुई भू-राजनीतिक दुनिया में रह रहे हैं। एक तरफ जहां चीन अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है और स्वयं को दुनिया की एकमात्र ऐसी महाशक्ति सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है, जिस पर वैश्विक आर्थिक संकट का कोई असर नहीं हुआ है, वहीं चीन के पड़ोसी मुल्क उसके इसी रवैये के आधार पर अपनी रणनीतियां निर्धारित कर रहे हैं।

चीन को नियंत्रित करने में अकेले भारत की क्या भूमिका होगी, इस बारे में बात करना अभी सरलीकरण होगा। यह भी साफ है कि भारत अमेरिका का प्रतिनिधि नहीं बनना चाहेगा। इसके बजाय अमेरिका, भारत और चीन के अन्य पड़ोसी मुल्क इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि चीन की हरकतों का सामना करने के लिए उन्हें साझा स्तर पर ही प्रयास करने होंगे।

स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में जापान, वियतनाम और मलयेशिया की जो यात्राएं कीं, उनसे भी यही जाहिर हुआ है कि वे चीन की परिधि में आने वाले एशियाई मुल्कों से अपने संबंध सुधारने का प्रयास करना चाहते हैं।

जापान द्वारा विवादित समुद्री क्षेत्र में अपनी नौकाओं को टक्कर मारने वाले चीनी फिशिंग बोट के कप्तान को गिरफ्तार कर लिए जाने पर बीजिंग ने हाल ही में स्पष्ट स्वरों में नाराजी का प्रदर्शन किया है। बीजिंग की धमकियों के बाद टोक्यो ने कप्तान को छोड़ने में ही भलाई समझी, फिर भी इससे बीजिंग के रवैये का पता चलता है।

दक्षिण चीनी समुद्र में विवादित द्वीपों पर चीन के रुख को लेकर वियतनाम पहले ही नाराजी जता चुका है। चीन ने वियतनामी मछुआरों को पूरे हफ्तेभर के लिए अपने यहां कैद कर रखा था। वहीं कुआलालंपुर भी बीजिंग की हरकतों पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि मलयेशिया में चीनी मूल के रहवासियों की बड़ी आबादी है।

राष्ट्रपति ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे का जिस तरह अनुमोदन किया, उसे एक दूसरे परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। ओबामा अपने इस कदम के जरिये चीन को यह संदेश दे देना चाहते थे कि एशिया में अमेरिका अपना दबदबा कायम रखना चाहता है और इसके लिए क्षेत्र में उसके कई महत्वपूर्ण मित्र राष्ट्र हैं।

अमेरिका की राज्य सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि दक्षिण चीनी समुद्र में चीन के अपने पड़ोसियों से जो विवाद हैं, उन्हें सुलझाने में वॉशिंगटन की दिलचस्पी होगी। हिलेरी के इस कथन पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। भारत यह उम्मीद करना चाहेगा कि पड़ोसी देशों द्वारा एकजुट होकर राय-मशविरा करने पर चीन को अपनी नीति और अपने रवैये पर नए सिरे से विचार करने पर मजबूर होना पड़े।

एक मायने में चीन ने ओस्लो में नोबेल शांति पुरस्कार समारोह, जिसमें चीन के राज्यबंदी लियू शाओबो को पुरस्कार प्रदान किया जाना था, से यूरोपीय देशों को दूर रहने की हिदायत देकर अपनी मर्यादाओं को लांघने की कोशिश की है। वैसे भारत के पड़ोसियों ने इस पर भी गौर किया है कि नईदिल्ली ने नोबेल शांति पुरस्कार पर आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

दक्षिण एशिया क्षेत्र के देश चाहते हैं कि क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व के बरक्स भारत एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हुए शक्ति संतुलन स्थापित करने का प्रयास करे। ऐसे में जापान भारत का सबसे महत्वपूर्ण मित्र सिद्ध हो सकता है। चीन और जापान के संबंध अगर विस्फोटक नहीं हैं तो उन्हें शांतिपूर्ण भी नहीं कहा जा सकता।

एक मायने में ओबामा ने भारत यात्रा का उपयोग यह सिद्ध करने में किया है कि एशिया और प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अपनी दखलंदाजी जारी रखना चाहता है और उसकी यह मंशा कतई नहीं है कि इस क्षेत्र को चीन के हवाले कर दे। अगर अमेरिका अपनी इस रणनीतिक लड़ाई में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण मानता है तो यह इस बात का संकेत है कि भारत की सामथ्र्य और उसके आर्थिक विकास के महत्व को दुनिया में स्वीकार कर लिया गया है।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को केवल यह साबित करने के लिए चीन के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण रवैया अख्तियार कर लेना चाहिए कि अपने हितों की रक्षा करने के लिए वह न केवल ताकत पर भरोसा करता है, बल्कि इस क्षेत्र में उसके कुछ ताकतवर साथी भी हैं।

चीनी नेतृत्व के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि वह अपनी क्षेत्रीय नीतियों को नए सिरे से निर्धारित करे और एक बदलती हुई दुनिया के परिप्रेक्ष्य में अपनी शक्तियों को ज्यादा सहजता से ले। इसमें कोई शक नहीं कि वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और अन्य मसलों पर समय-समय पर बातचीत होती रहेगी।

लेकिन वे दिन अब लद गए हैं, जब कोई भी दो देश मिलकर दुनिया की जटिल से जटिल समस्याओं को सुलझाने के प्रयास करते थे। बेशक भारत अमेरिका के इस विचार का स्वागत करता है कि अमेरिका से आगे जाने में चीन को अभी पचास साल लगेंगे, लेकिन फिर भी वह लंबे समय तक दुनिया की आर्थिक और सैन्य ताकत बना रहेगा। एशिया में अपना वजूद बनाए रखने के लिए वॉशिंगटन को जो नया समर्थन मिल रहा है, उससे वह संतुष्ट ही होगा।

संक्षेप में कहें तो अपनी क्षेत्रीय नीतियों को तय करने के लिए भारत को अपनी ही ताकत पर भरोसा करना होगा, लेकिन साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर ताकतवर दोस्त महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। ओबामा की यात्रा ने हमें फिर याद दिलाया है कि हम जिस क्षेत्र में हैं, वहां भू-राजनीतिक समीकरण किस कदर बदल रहे हैं।

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